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हरतालिका तीज 2026: सिंधारा दोज से होती है व्रत की शुरुआत, जानिए इसका धार्मिक महत्व

The image depicts Lord Shiva and Goddess Parvati, with a worship platter placed before them containing items such as a *kalash* (ritual pot), incense sticks, flowers, a lamp, a banana, an apple, and other offerings.
Sindhara Dooj 2026: वर्ष 2026 में सिंधारा दूज श्रावण शुक्ल द्वितीया 14 अगस्त 2026 शुक्रवार को है। यह पर्व हरियाली तीज से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। इसके बाद भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को सिंधारा दोज भी आती है जिसे सिंधारा दूज या सौभाग्य द्वितीया कहा जाता है। यह दिन अगले दिन आने वाले हरतालिका तीज के कठिन निर्जला व्रत की तैयारी और उत्साह की शुरुआत का प्रतीक है।

सिंधारा दोज क्यों मनाई जाती है?

सिंधारा दूज हरियाली तीज से एक दिन पहले आती है और इसे हरियाली तीज के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन मायके से बेटी या बहू के लिए "सिंधारा" भेजा जाता है, जिसमें मुख्य रूप से ये चीजें होती हैं, जिसमें मिठाई में विशेष रूप से घेवर, मठरी आदि। श्रृंगार का सामान, जिसमें  मेहंदी, चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, आभूषण और अन्य सुहाग की वस्तुएं तथा नए परिधान यानी वस्त्र होते हैं।
 
यह सिंधारा बेटी के प्रति माता-पिता के स्नेह, आशीर्वाद, खुशहाली और समृद्धि की कामना का प्रतीक होता है। यदि बेटी ससुराल में है तो मायके से सिंधारा भेजा जाता है, और यदि बहू मायके गई हो तो ससुराल से सिंधारा आता है। सिंधारे में आई मेहंदी को सुहागिनें अपने हाथों में लगाती हैं और अगले दिन तीज का व्रत करती हैं। यह पर्व पति-पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाने और सुख-समृद्धि की कामना के लिए भी मनाया जाता है।
 

सिंधारा दोज की परंपराएं और महत्व

सिंधारा (शृंगार और उपहार) का आदान-प्रदान:

सिंधारा शब्द 'शृंगार' से बना है। इस दिन नवविवाहित महिलाओं या बेटियों के लिए मायके या ससुराल की तरफ से 'सिंधारा' भेजा जाता है।
इसमें 16 शृंगार की वस्तुएं (मेहंदी, सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, साड़ी आदि) और विशेष मिठाइयां (जैसे घेवर) दी जाती हैं।

माता गौरी की पूजा:

सिंधारा दूज के दिन महिलाएं मां पार्वती (गौरी) और ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा कर अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मांगती हैं।
 

व्रत का संकल्प और तैयारी:

हरतालिका तीज का व्रत अत्यंत कठिन होता है। इसलिए सिंधारा दोज के दिन महिलाएं मेहंदी लगाती हैं, शृंगार करती हैं और शारीरिक व मानसिक रूप से अगले दिन के निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं।
 

हरतालिका तीज व्रत का महत्व

हिंदू धर्म में हरतालिका तीज व्रत का विशेष स्थान है, जो मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा अखंड सौभाग्य के लिए और अविवाहित कन्याओं द्वारा मनचाहा वर पाने के लिए रखा जाता है।

पौराणिक संदर्भ (शिव-पार्वती का मिलन):

'हरतालिका' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- 'हरत' (हरण करना) और 'आलिका' (सखी/सहेली)। मान्यता है कि माता पार्वती के पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते थे, लेकिन माता पार्वती भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थीं। तब उनकी सहेलियां उन्हें हरण करके एक घने जंगल में ले गईं, जहां माता पार्वती ने कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

कठोर निर्जला व्रत:

इस व्रत में महिलाएं पूरे दिन और रात बिना अन्न और जल (निर्जला) ग्रहण किए रहती हैं।
मिट्टी की मूर्तियों का पूजन:
संध्या या प्रदोष काल में रेत या काली मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश जी की प्रतिमाएं बनाकर विधिवत पूजन किया जाता है।  
 
अखंड सौभाग्य का वरदान:
मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ता है, गृहक्लेश दूर होते हैं और पति की आयु दीर्घ होती है।
 
सिंधारा दोज खुशियों, शृंगार और मायके-ससुराल के रिश्तों को मजबूत करने का संदेश लाती है, जो हरतालिका तीज के पावन व्रत के लिए भक्ति और उत्साह का माहौल तैयार करती है।
 
 
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