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ध्यान गुरु अर्चना दीदी : अशांति के कोलाहल के बीच शांति का स्वर

Updated: शुक्रवार, 25 मार्च 2016 (14:23 IST)
सृजन में शोर नहीं होता। साधना के जुबान नहीं होती, किंतु सिद्धि में वह शक्ति होती है कि हजारों पर्वतों को तोड़कर भी उजागर हो उठती है। यह कथन ध्यानगुरु अर्चना दीदी पर अक्षरशः सत्य सिद्ध होता है। अर्चना दीदी ने साधना के क्षेत्र में जो प्रगति की है, वह बेजोड़ है।

 

चार साल की बालावस्था में उनमें गहन आध्यात्मिकता की विलक्षण रश्मियां प्रवाहित होने लगी। इस बात को उनके चारों ओर बहुत ही कम समय में हर कोई महसूस करने लगा था। खेलने-कूदने की उम्र में उन्हें भीतर की यात्रा में तल्लीन पाया गया। समय के साथ उनकी निरंतर और कठिन ध्यान और साधना ने उन्हें सिद्धि प्रदत्त की और वे जन-जन को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने में सक्षम बनी। 
 
'सद्गुरु' के रूप में उनका अभिषेक किया गया और उन्होंने विशेषतः चक्र और कुंडलिनी शक्ति के एक निपुण गुरु के रूप में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने सुख, शांति, प्रेम और आध्यात्मिकता के प्रसार के उद्देश्य से सेलिब्रेटिंग लाइफ फाउंडेशन की स्थापना की। इस फाउंडेशन का उद्देश्य आनंद, शांति और जीवन-उत्सव के साथ सत्य को प्राप्त करना है।
 
ध्यान व ज्ञान कि मूर्तिमान स्वरूप अर्चना दीदी के दिव्य सान्निध्य में जब ॐ साधना का दुर्लभ अलौकिक अवसर प्राप्त होता है तब उनके मुखारविन्द से इस ॐ दिव्य ध्वनि की शक्तिशाली तरंगों, प्रकम्पनों से सम्पूर्ण वातावरण को तरंगित होते हुए देखने का साधकों का अनुभव उन्हें एक अलग ही दुनिया का अहसास कराता है। इसके लिए वे विभिन्न स्थानों पर शिविरों, सेमिनार, योग और प्राणायाम कार्यशालाओं का आयोजन कर साधकों को स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की यात्रा कराती है। 
 
जो साधक इस अवसर की दुर्लभता तथा महत्ता को समझता है, वही उस परम की परीक्षा में उत्तीर्ण होता है। इसी के साथ-साथ गरीब, अनाथ, बेसहारा बच्चों, शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों एवं वृद्धाश्रम के वरिष्ठ नागरिकों एवं महिलाओं के लिए विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का संचालन कर वे खुशी देने और खुशी बटोरने की जीवनशैली को साकार कर रही है। आत्मविकास के साथ-साथ जन-जन के विकास को ही उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है और यह एक दुर्लभ संयोजन है जो कम लोगों में देखने को मिलता है। 
 
 

 
अर्चना दीदी साधना क्षेत्र की एक महान विभूति हैं। वे साधना की उच्चतम परम्पराओं, संस्कारों और महत जीवन-मूल्यों से प्रतिबद्ध एक महान व्यक्तित्व हैं। उनमें योग, साधना, तितिक्षा, आत्मसंपन्नता और तेजस्विता का अप्रतिम समन्वय है।
 
आत्म-संपन्नता का अर्थ है- अपनी अस्मिता को पहचानना, आत्मा के स्तर पर विकसित होना। आई क्यू- इंटेलीजेंस क्वेशंट, ई-क्यू- इमोशनल क्वेशंट से भी आगे- एसक्यू- स्प्रिच्युअल क्वेशंट के स्तर को विशेष रूप से विकसित करना। क्योंकि आध्यात्मिक विकास के बिना मानसिक और भावनात्मक विकास अधूरे हैं। आध्यात्मिक लब्धि एसक्यू को व्यक्तित्व के मानवीय पहलू का आईना कहा जा सकता है। वर्तमान समय तक आते-आते यह पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है कि जिस तरह आईक्यू- एवं ईक्यू- के बिना व्यक्तित्व अधूरा है उसी तरह एसक्यू के बिना बेहतर व्यक्तित्व की कल्पना करना भी अर्थ शून्य है। 
 
यह कहा जा सकता है कि जिस व्यक्ति में एसक्यू नहीं है, उसका मानवीय पक्ष बेहद कमजोर होता है। आत्म-सम्पन्नता के अग्रिम आयाम हैं - व्यक्ति के भीतर अपने समय के बारे में, समाज के बारे में सोचने व निर्णय लेने की क्षमता का होना, अगली पीढ़ी का निर्माण अपना दायित्व समझना, चेतना के हथियारों से लड़ना और चरित्र-संपन्न होना। अर्चना दीदी का व्यक्तित्व इन्हीं तत्वों के ताने-बाने से बुना हुआ है।
 
अर्चना दीदी की ध्यान साधना, वैचारिक उदात्तता, ज्ञान की अगाधता, आत्मा की पवित्रता, सृजन-धर्मिता, अप्रमत्तता और विनम्रता उन्हें विशिष्ट श्रेणी में स्थापित करती है। उनकी सत्य निष्ठा, चरित्र निष्ठा, सिद्धांत निष्ठा और अध्यात्म निष्ठा अद्भुत है। ध्यान साधना के क्षेत्र में उन्होंने नए आयाम उद्घाटित किए हैं, सफलता को अर्जित किया है, एक नई पहचान बनाई है। इस शुभ्रवसना सरस्वती के विग्रह में एक दृढ़ निश्चयी, गहन अध्यवसायी, पुरुषार्थी और संवेदनशील साधक-आत्मा निवास करती है। उनका आध्यात्मिक एवं बौद्धिक व्यक्तित्व अप्रतिम एवं समग्र दृष्टि से परिपूर्ण है। उनमें आत्मानुशासन, श्रद्धा, समर्पण, चैतन्य के सूक्ष्म स्पंदन जैसे नैसर्गिक गुण हैं। उनका जीवन अथाह ऊर्जा से संचालित तथा स्वप्रकाशी है।

वह एक ऐसा प्रभापुंज है जिससे निकलनेवाली एक-एक रश्मि का संस्पर्श जड़ से चेतना का संचार करता है। उनके दीप्तिमान व्यक्तित्व की एक विशेषता है ग्रहणशीलता। जहां भी उत्कृष्ट नजर आता है, उसे ग्रहण कर लेती है और स्वयं को समृद्ध बनाती जाती है। कहा है, आंखें खुली हो तो पूरा जीवन ही विद्यालय है- जिसमें सीखने की तड़प है वह प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक घटना से सीख लेता है। जिसमें यह कला है, उसके लिए कुछ भी पाना या सीखना असंभव नहीं है। इमर्सन ने कहा था, 'हर शख्स जिससे मैं मिलता हूं, किसी न किसी बात में मुझसे बढ़कर है, वही मैं उससे सीखता हूं।' 
 
अर्चना दीदी प्रकृति प्रेमी हैं। प्रकृति के प्रांगण में प्रवेश करते ही उन्हें अतिरिक्त प्रसन्नता की अनुभूति होती है। इसलिए जब, जहां खुली हवा, हरे-भरे खेत-खलिहान, नदी, पर्वत आदि दृश्य उनके दृष्टिपथ में आते हैं, उनका चिंतन उसी की परिक्रमा करने लगता है। अध्यात्म एवं योग साधना के सूत्रों की मीमांसा होने लगती है।
 
 

 

अर्चना दीदी की मेघा के दर्पण से भारतीय दर्शन, ध्यान, साधना, न्याय, योग, विज्ञान, मनोविज्ञान आदि बहुआयामी पावन एवं उज्ज्वल बिम्ब उभरते रहे हैं। आपमें धर्म के प्रति अत्यंत गहरी श्रद्धा है। आपकी विनम्रता, सरलता, सादगी, गुणग्राह्यता विलक्षण एवं अनुकरणीय हैं। अतुलनीय संपदाओं की धनी अर्चना दीदी विशेषतः चक्र और कुण्डलिनी की योग साधना के साथ-साथ नारी उन्नयन एवं उत्थान की भी प्रेरक है। 
 
ज्ञान-विज्ञान एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों की ऊंचाई और अपार जनप्रियता को पाने के बाद भी आपकी सहज सरलता व विनम्रता मन को प्रभावित करती है। एक विशाल साधक-साधिकाओं का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक नेतृत्व करते हुए भी आपके रोम-रोम से करुणा के चंदन की शीतल महक फूटती है। आपकी आंखों में सर्वकल्याण की कामना के दर्शन होते हैं। आपकी वाणी से सदा सर्वमंगल के फूल बरसते हैं। ऐसे महासाधिका की करुणा से आप्लावित होने का दुर्लभ अवसर समय-समय पर देश-विदेश के श्रद्धालुओं और साधकों उपलब्ध होता है तब वे धन्यता का अनुभव करते हैं।
 
वर्तमान की राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में धर्म के पाखण्डी स्वरूप को देखते हुए ऐसी साधिकाओं से धर्म को नई दिशा देने की आशा की जा सकती है। उन्होंने धर्म के भव्य एवं गरिमामय अतीत को जीवंत करने का सार्थक प्रयास किया है। यहां धर्म संस्कार और जीवन प्रवृत्ति का मनोरम तालमेल हुआ है। 
 
आपका संपूर्ण जीवन जन-जन के कल्याण के लिए नियोजित है, श्रद्धा, आस्था और समर्पण ही आदर्श भारतीय संस्कृति का प्रेरक है और यही सब आपके जीवन का हार्द है। तेजस्वी व्यक्तित्व की धनी अर्चना दीदी का प्रगतिशील सफर सीख देता है कि संकल्प जब भी करो, पूरी प्राणवत्ता के साथ करो। कोई विकल्प शेष न रह जाए। हमारा संकल्प सृजनशील संकल्प हो। न उसमें विचारों का आग्रह हो, न परम्पराओं का व्यामोह है, न सिद्धांतों की कट्टरता हो, न क्रिया में जड़ता हो। समय का हर पल पुरुषार्थ का नया इतिहास रचे।

सफलता स्वयं उपलब्धि बने। संकल्प के साथ जुड़ा हो ऊंचा लक्ष्य। आपका भविष्य मानवता के अभ्युदय का उजला भविष्य है। उससे जुड़ी है मानवीय एकता, सार्वभौम साधना, सर्वधर्म समन्वय, सापेक्ष चिंतन शैली, भारतीय संस्कृति के विकास की नई संभावना। 
 
अर्चना दीदी ओजस्वी वक्ता हैं। वे हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में ही धाराप्रवाह बोलती हैं। जब वे बोलती हैं तो हजारों नर-नारियों की भीड़ उन्हें मंत्र-मुग्ध होकर सुनती है। अपने प्रवचनों में वे धर्म के गूढ़ तत्वों की ही चर्चा नहीं करती, उन्हें इतना बोधगम्य बना देती हैं कि उनकी बात सहज ही सामान्य-से-सामान्य व्यक्ति के गले उतर जाती है।
 
अर्चना दीदी जितनी प्रभावशाली वक्ता हैं, उतनी ही प्रभावशाली लेखिका/चिंतक भी हैं। वे चाहती हैं कि हमारा देश एक बार पुनः विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हो। मनुष्य अच्छा मनुष्य बने, उसके अंदर मानवीय गुणों का विकास हो, वह नैतिक और चारित्रिक दृष्टि से उन्नत बने, उसका आत्मिक विकास हो, अपने कर्त्तव्य को वह जाने और निष्ठापूर्वक उसका पालन करे, समष्टि के हित में वह अपना हित अनुभव करे- इस दृष्टि से अर्चना दीदी तत्पर है।

समग्र मानव समाज के लिए गहन एवं हितावह चिंतन करने वाली युगद्रष्टा अर्चना दीदी अपने आध्यात्मिक व्यक्तित्व और जन हितकारी उपक्रमों द्वारा जिस शोषणविहीन एवं सुख समृद्धि से परिपूर्ण आदर्श एवं सुखी समाज की परिकल्पना की है, वह वर्तमान की बड़ी जरूरत को पूरा करता है।

 

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ललि‍त गर्ग
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