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#अधूरीआजादी : हमारा इतिहास फिर से लिखे जाने की आवश्यकता है

Updated: मंगलवार, 8 अगस्त 2017 (20:33 IST)
डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है। यह हिन्दू शासकों के लिए भी उतना ही सही है, जितना कि मुस्ल‍िम शासकों के लिए। अतीत के लिए भी, आज के लिए भी।
 
ग़ौरी, गज़नवी, चंगीज़, तैमूर, दुर्रानी, अब्दाली जैसे मुस्ल‍िम आक्रांता लूटखसोट की फ़िराक़ में थे। हिन्दुस्तान पर राज करने की उनकी नीयत ना थी। ख़ासतौर पर 1739 में पहले नादिर शाह और फिर 1761 में अहमद शाह ने तो हिंदुस्तान की केंद्रीय सल्तनत को उसके घुटनों पर झुका दिया था। अनेक इतिहासकारों को अचरज होता है कि नादिर शाह महज़ "तख़्तेताऊस" की लूट से ही ख़ुश था, जबकि चाहता तो हिंदुस्तान की बादशाहत उसके नाम होती! चंगीज़ो तैमूर के वंशज बाबर ने अपने लश्कर का रुख़ हिन्दुस्तान की ओर इसलिए मोड़ा था, क्योंकि समरकन्द को जीतने में वो लगातार नाकाम रहा था। लेकिन चंगीज़ो तैमूर के उलट उसने हिन्दुस्तान में खूंटा गाड़ दिया, जैसे उससे पहले गाड़ा था मामलूक़ों, तुग़लकों, खिलजियों और लोदियों ने।
 
लेकिन अवाम? 
इतिहासकार इस समूची परिघटना को "कॉन्क्वेस्ट" के तर्क के साथ याद रखते हैं और निहायत ग़ैरसहानुभूतिपूर्ण तरीक़े से अवाम के अंतर्तम पर बात करने से इनकार करते हैं। 
जिसकी तलवार, उसका ज़ोर!
जिसकी लाठी, उसकी भैंस!
तब सदियों तक चले "हिन्दू जेनोसाइड" की तो बात ही क्या करें, जब कश्मीर में पंडितों के जेनोसाइड को ही रद्द करने के लिए महाकविगण कमर कसे हों!  ये तमाम सिलसिला जैसे भुला देने लायक़ हो और "प्रतिशोध के काव्य-न्याय" का, "सामूहिक अवचेतन की तुष्टि" का यहां कोई महत्व ही ना हो, जिसे कि "सामाजिक न्याय" की व्यवस्था की धुरी माना गया! हुक़ूमत और अवाम के रिश्तों को लेकर लोहिया की बात सही है और "ग्रेट मुग़ल्स" के राज में भी हिन्दुस्तान में "ह्यूमन राइट्स इंडेक्स" बहुत ऊपर चला गया हो, वैसा नहीं था।
 
अकबर के राज में बहुत अमन था, कलाओं का बहुत विस्तार था, गंगा-जमुनी का स्वर्णकाल था, ऐसा कहते हैं, लेकिन हिन्दू बहुसंख्य समाज यवनों के राज में मनोवैज्ञानिक रूप से मुतमईन कैसे रह सकता था? हमारा इतिहास इस मनोवैज्ञानिक बेचैनी का अध्ययन करने के बजाय उस पर संगीन चुप्पी साध लेता है। आज अगर अरब देशों पर कोई हिन्दू या यहूदी राजा अधिकार कर ले और बेहतर सुशासन स्थापित कर दे, तो क्या वहां के मुसलमान इस पर राज़ी ख़ुशी से रहेंगे?  आज़ादी की लड़ाई में "गंगा जमुनी" का "पर्सपेक्टिव" बदल गया था और अब वे दोनों मिलकर एक "साझा दुश्मन" से लड़ रहे थे। तो क्या उस साझा दुश्मन का वजूद ही उस भाईचारे का परिप्रेक्ष्य था? और अगर, वह शत्रु परिदृश्य से हट जाए तो? आज़ादी के समय हिन्दू मुसलमान दोनों ही समान रूप से ग़रीब और पसमंदा इसलिए भी थे कि अधिकतर मुसलमान तो "कनवर्टेड" थे। वे वही थे, जो उनसे पहले हिन्दू हुआ करते थे, और हुक़ूमत के मेवे उन तक नहीं पहुंचे थे।   आज अकसर भारतीय मुसलमान कहते हैं कि हम तो "कनवर्टेड" हैं, इसलिए हम तो इसी देश के मूल निवासी हैं। लेकिन यह बात 1947 में उनको याद क्यों नहीं आई थी, जब उन्होंने अपना अलग मुल्क मांगा था?

मुझे बार बार लगता है हिन्दुस्तान का इतिहास एक नए "नॉन सेकुलर" और "मोर एनालायटिकल पर्सपेक्टिव" के साथ लिखे जाने की ज़रूरत है।  हमें एक भ्रामक इतिहास पढ़ाया जाता रहा है। 
"अ पोलिटिकली मोटिवेटेड एंड अपोलोजेटिक रीडिंग ऑफ़ हिस्ट्री"। इसको दुरुस्त करना ज़रूरी है!
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लेखक के बारे में
सुशोभित सक्तावत

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