महिला सशक्तीकरण जरूरी

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बस्तियों में रहने वालों पर। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने तो इस स्वराज और इस तरह की आर्थिक आजादी की कल्पना नहीं की थी। जो गाँव को हाशिए पर ढकेले और गरीबों को और गरीब बनाए। गरीब वर्ग अभी भी उन महत्वपूर्ण उपलब्धियों से वंचित है जो देश ने विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों में हासिल की है। उनके पास अभी भी बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैैं, शिक्षा नहीं है जो उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़े।

देश की आर्थिक नीतियाँ गाँधी के स्वराज और स्वदेशी की परिभाषा से मेल नहीं खातीं। आर्थिक नीति ग्रामीणों या गाँव के कल्याण को ध्यान में रखकर कभी नहीं तैयार की जातीं। गाँधीजी गाँवों में जाकर लोगों से उनका दुख-दर्द और उनकी परेशानी बाँटा करते थे। पर अब राजनेता गाँवों में नहीं जाते। वे जब गरीब और किसानों की समस्याएँ नहीं सुनते तो उनके लिए नीतियाँ बनाने की कौन सोचे? इसलिए जो गरीब है वह और गरीब हो रहा है, गाँवों से शहरों में रोजगार की तलाश में जाने वालों का पलायन रुक नहीं रहा। महात्मा गाँधी उद्योगों की स्थापना के खिलाफ कभी नहीं रहे।

वे कहते थे कि मैं उद्योग लगाए जाने या मशीनों के इस्तेमाल के खिलाफ नहीं हूँ पर मैं ऐसे उद्योग या मशीनों का हिमायती भी नहीं हूँ जो बहुत से लोगों को बेरोजगार बनाकर चंद लोगों को अमीर बनाए। इसलिए उन विकल्पों पर सोचो जो सबको रोटी मुहैया कराए। गाँधीजी का यह कथन उस परिप्रेक्ष्य में था कि समय के साथ खेतों पर दबाव बढ़ता जाएगा। जनसंख्या बढ़ेगी तो खेत सबको भोजन देने में सक्षम नहीं रहेंगे।

लिहाजा खेती के साथ चरखा से सूत कातने और अन्य ग्राम आधारित रोजगार शुरू करने पर उनका जोर रहा। पर गाँधीजी की इस अवधारणा को मूर्तरूप देने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी दिखाई देती है। ऐसा गाँधीजी को विश्वास था कि देश की निर्र्धनता को दूर करने के लिए कुटीर उद्योग के पुनर्जीवन की आवश्यकता है। बस एक उद्योग का पुनर्जीवन हो जाए तो अन्य सभी उद्योग उसका अनुगमन कर सकेंगे। काश महानगरों औैर शहरों की तरक्की के लिए फिक्रमंद राजनेता इस मर्म को समझ पाते।

औद्योगिक विकास के चलते शहरी तबके और कुछ हद तक गाँव से पलायन कर शहरों में आने वाले लोगों की आर्थिक तरक्की तो की है पर लघु उद्योग धंधें को नष्ट हो गए हैं। लाखों किसान अपनी माँ स्वरूपा धरती को गाँव के साहूकारों के हाथों सदा के लिए खोकर शहर जाने को मजबूर हो गए हैं। याद कीजिए प्रेमचंद की कालजयी कहानी 'गोदान' या बिमल दा की बहुचर्चित फिल्म 'दो बीघा जमीन' के उस रिक्शे वाले को। जो गाँव छोड़कर शहर तो पहुँच गया पर अपनी जमीन छुड़ाने गाँव नहीं लौटा। ग्रामीणों को किसानों को खेती के अलावा भी वैकल्पिक रोजगार की जरूरत है जो फसल अच्छी नहीं होने या किसी प्राकृतिक आपदा के संकट में अपने परिवार का पेट पाल सके।

हमने पहले कभी किसानों की आत्महत्या की बात नहीं सुनी। पर पिछले कुछ सालों में जिस तरह विदर्भ के किसानों ने आत्महत्या की है उसने पूरे देश को दहला दिया। यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि किसानों को किस तरह कर्ज मुहैया कराया गया कि वे आत्महत्या करने लगे। महानगरों की बढ़ती चकाचौंध और यहाँ की तरक्की गाँवों में बैठे लोगों में हताशा और कुंठा पैदा कर रही है क्योंकि उनके पास वह संसाधन नहीं हैं जो शहर के लोगों के पास हैं। उस पर टेलीविजन ने ग्रामीणों की आकांक्षाएँ और बढ़ा दी हैं। गाँधी के सर्वोदय की सबसे बड़ी सोच यही थी कि चाहे डॉक्टर हो, नाई या एक शिक्षक। इन पेशे से जुड़े व्यक्ति को एक जैसा पैसा मिलना चाहिए। इससे अमीरी-गरीबी की खाई चौड़ी नहीं होगी और लोगों में एक-दूसरे के लिए वैमनस्य नहीं होगा।

गाँधीजी को लगता था कि खादी एक सही आर्थिक साध्य है। यह लाखों लोगों को बेकारी की त्रासदी से बचाने और जब तक कि देश के सभी महिला-पुरुष को अजीविका हासिल न हो जाए, उस स्थिति के लिए एक बेहतर विकल्प है। पर आज खादी का प्रचार तो बहुत है लेकिन खादी के पीछे छिपी भावना उपभोक्तावादी संस्कृति में कहीं लुप्त हो गई है।

आजादी के बाद आर्थिक तरक्की का कुछ फायदा महिलाओं को भी मिला है। अब वे भी नौकरियों पर जाने लगी हैं, अपने पैरों पर खड़ी हैं पर इसमें भी बड़ा तबका शहरी और मध्यमवर्गीय महिलाओं का है। गाँव की महिलाओं के पास अभी भी रोजगार के सीमित साधन हैं। अशिक्षा उनकी राह में अब भी सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। देखें कि आजाद भारत में देश की सभी महिलाओं को सशक्त बनाने का गाँधीजी का सपना कब पूरा होता हैं ?
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- डॉ. सविता सिंह आजादी के इतने सालों बाद जब अपने देश को देखती हूँ तो लगता है हम काफी ऊँचाइयों पर पहुँच गए हैं। बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें, तेज दौड़ती गाड़ियाँ और लोगों की बढ़ती आय से यह जाहिर है कि भारत ने बहुत तरक्की की है; यह किसी चमत्कार से कम नहीं कि जिस देश में सुई भी नहीं बनती थी वहाँ बड़े-बड़े कारखाने चल रहे हैं, छोटी चीजों से लेकर महत्वपूर्ण मशीनें तक देश में ही तैयार की जा रही हैं, रेल की पटरियाँ पूरे देश में फैल गई हैं पर यह किस कीमत पर हो रहा है ?
नजर डालिए अपने शहर की बहुमंजिला इमारतों के साए में कराहती, दम तोड़ती गंदी
(लेखिका गाँधी स्मृति और दर्शन समिति की नई दिल्ली की निदेशक हैं)



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