मनुवाद और ब्राह्मणवाद को लेकर बड़ा भ्रम! जानिए पूरी सच्चाई
भारतीय राजनीति में 'मनुवाद' और 'ब्राह्मणवाद' शब्दों का व्यापक प्रयोग और दुरुपयोग देखने को मिलता है। अब यह भी देखा गया है कि हर आंदोलन में इन तथाकथित वाद के खिलाफ नारे लगाए जाते रहे हैं। हाल के दशकों में भारत के प्रमुख विश्वविद्यालयों (जैसे JNU, HCU, DU, TISS) में हुए छात्र आंदोलनों के बाद हाल ही में CJP के प्रोटेस्ट में भी मनुवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ नारे लगाए जाने के मामले सामने आए हैं जिसके चलते CJP के प्रोटेस्ट को मुद्दों से भटकाने का कार्य किए जाने के आरोप भी लगे थे। आखिर ये मनुवाद और ब्राह्मणवाद है क्या बला, चलिए इस पर डालते हैं एक संक्षिप्त नजर।
1. 'मनुवाद' और 'ब्राह्मणवाद': शब्दावली का भ्रम एवं यथार्थ
मनुवाद की अवधारणा: 'मनुवाद' शब्द पिछले सात-आठ दशकों में प्रचारित एक राजनीतिक और वैचारिक शब्द है। मूल रूप से 'स्मृति' या 'संहिता' का अर्थ आदर्श सामाजिक नियमों से होता है, जबकि 'वाद' दर्शनशास्त्र का विषय है (जैसे मार्क्सवाद या गांधीवाद)। अतः किसी संहिता को वाद का रूप देना वैचारिक भ्रम उत्पन्न करता है।
ब्राह्मणवाद का आधुनिक रूप: यदि जन्म, कुल, जाति या वर्ग के आधार पर किसी व्यक्ति को योग्यता या विशेष अधिकार दिए जाएं (जैसे केवल जन्म के आधार पर पुजारी बनना), तो उसे जनसामान्य 'ब्राह्मणवाद' कहता है। आधुनिक परिदृश्य में, जब योग्यता के बजाय केवल जन्म या वर्ग के आधार पर सुविधाएं, छूट या विशेषाधिकार (जैसे आरक्षण या विशेष कानून) दिए जाते हैं, तो यह भी उसी व्यवस्था का आधुनिक रूप माना जा सकता है।
2. मनु का ऐतिहासिक स्वरूप
राजा के रूप में पहचान: मनु कोई ब्राह्मण नहीं थे, बल्कि वे एक राजा थे। मनु के संबंध में समाज में कई भ्रांतियां हैं।
14 मनु परंपरा: पौराणिक और ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार अब तक 14 मनु हुए हैं (स्वायंभुव, स्वारोचिष, औत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मासावर्णि, धर्मसावर्णि, रूद्रसावर्णि, देवसावर्णि और इन्द्रसावर्णि)।
प्रमुख मनु: इनमें स्वायंभुव मनु (प्रथम) और वैवस्वत मनु (सातवें) की चर्चा सर्वाधिक होती है। मूल 'मनुस्मृति' का संबंध स्वायंभुव मनु की परंपरा से जोड़ा जाता है।
3. मनुस्मृति का विषय-विस्तार और महत्व
मनुस्मृति को समाजशास्त्र का विश्व में प्रथम ग्रंथ माना जाता है।
विस्तृत विषय-वस्तु: इसमें सृष्टि के प्रारंभ, समय-चक्र, वनस्पति ज्ञान, राजनीति शास्त्र, अर्थव्यवस्था, अपराध नियंत्रण, प्रशासन, सामान्य शिष्टाचार और सामाजिक जीवन के सभी अंगों पर विशद जानकारी मिलती है।
वैश्विक प्रभाव: संसार की कई प्राचीन सभ्यताओं और कानूनों के निर्माण में मनुस्मृति के सिद्धांतों का अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष प्रभाव देखा गया है।
4. हिंदू समाज और धर्मग्रंथों में मनुस्मृति का स्थान
हिंदू समाज की व्यवस्था और धार्मिक पद्धतियां मनुस्मृति के अधीन नहीं रही हैं। कालांतार से ही कभी भी इसका न कोई पाठ करता आया है, न इस ग्रंथ को घर में रखा जाता है और न ही इसका कोई साधु, संत या कथावाचक प्रचार प्रसार करता है।
श्रुति बनाम स्मृति: हिंदू परंपरा में वेदों को 'श्रुति' (सर्वोच्च धर्मग्रंथ) और अन्य ग्रंथों को 'स्मृति' (समय के अनुसार परिवर्तनशील सामाजिक नियम) माना गया है। स्मृतियों में मनुस्मृति सहित लगभग 18 प्रमुख स्मृतियां हैं।
धर्मग्रंथ का दर्जा नहीं: मनुस्मृति को कभी भी हिंदुओं का मुख्य धर्मग्रंथ नहीं माना गया। इसका न तो मंदिरों में पाठ होता है और न ही इसे पूजा-पाठ का आधार बनाया जाता है।
सामाजिक रीति-रिवाज: हिंदू समाज के विवाह, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार और पूजा-पद्धतियां स्थानीय संस्कृति, समाज, परंपराओं और वेदों के 16 संस्कारों पर आधारित हैं, न कि मनुस्मृति पर।
5. कालानुक्रमिक संशोधन और अंग्रेजों द्वारा हेरफेर
मनुस्मृति का वर्तमान स्वरूप ऐतिहासिक परिवर्तनों और औपनिवेशिक नीतियों का परिणाम है।
ऐतिहासिक संशोधन: परंपरा के अनुसार, स्वायंभुव मनु द्वारा रचित मूल विचारों को आगे चलकर 14वें मनु (इन्द्रसावर्णि) के काल में परिष्कृत किया गया। शंकराचार्य और शबरस्वामी जैसे दार्शनिकों ने भी इसे संदर्भ रूप में उद्धृत किया है।
औपनिवेशिक दौर (ब्रिटिश काल) में हेरफेर: ब्रिटिश शासन के दौरान इस ग्रंथ में बड़े पैमाने पर परिवर्तन और हेरफेर किए गए। अंग्रेजों ने इसे ही हिंदू कानून (Hindu Law) का मुख्य आधार बनाकर प्रचारित किया ताकि सामाजिक विभाजन पैदा किया जा सके।
स्वतंत्रता के बाद की स्थिति: स्वतंत्रता के बाद भी अंग्रेजों द्वारा बनाई गई इस व्यवस्था और भ्रांतियों को सुधारने के पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए, जिससे यह औपनिवेशिक दृष्टिकोण आगे भी चलता रहा।
चार वर्णों का इतिहास, जानिए जातिवाद की सचाई:
प्राचीन इतिहास और समाजशास्त्र में ब्राह्मणवाद जैसा कोई शब्द का प्रयोग नहीं होता रहा है। पूर्व वैदिक काल तक चार वर्णों जैसी कोई व्यवस्था नहीं विकसित हुई थी। आदिकाल में वर्तमान जैसी जन्म-आधारित जातियां नहीं थीं, बल्कि वंशगत समाज (देव, दैत्य, दानव, नाग आदि) थे। ऋग्वेद में राजा ययाति की संतानों से बने 5 कबीलों (पंचनंद) का उल्लेख मिलता है, जो बाद में आर्य और दस्यु विचारधाराओं में विभाजित हुए। समय के साथ समाज में वर्ण व्यवस्था का उदय हुआ, जिसके संबंध में 3 मुख्य सिद्धांत प्रचलित हैं।
1. दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत (ऋग्वेद - पुरुषसूक्त)
सृष्टि के संचालन के लिए विराट पुरुष (ईश्वर) के विभिन्न अंगों से चार शक्तियों/वर्णों का उद्भव माना गया:
मुख (ब्राह्मण): ज्ञान, विवेक और मार्गदर्शन।
भुजाएं (क्षत्रिय): शक्ति, रक्षा और व्यवस्था।
उदर/जंघा (वैश्य): पोषण, अर्थव्यवस्था और संतुलन।
पैर (शूद्र): गति, श्रम और सेवा का आधार।
(जैसे शरीर के सभी अंग अनिवार्य हैं, वैसे ही समाज की पूर्णता के लिए चारों वर्णों का सामंजस्य आवश्यक था।)
2. गुण से उत्पत्ति का सिद्धांत (सूक्ष्म ऊर्जा/व्यक्तित्व)
त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) की प्रधानता के आधार पर वर्ण तय हुए:
सतोगुण प्रधान: ज्ञान और सत्य के शोधक- ब्राह्मण
रजोगुण प्रधान: साहसी और रक्षक- क्षत्रिय
रज-तम का संतुलन: व्यापार और सृजन करने वाले- वैश्य
तमोगुण प्रधान: शारीरिक श्रम और सेवा करने वाले- शूद्र
3. कर्म से उत्पत्ति का सिद्धांत (योग्यता और चुनाव)
शुरुआत में वर्ण व्यवस्था जन्म से नहीं, बल्कि कर्म (पेशे के चुनाव) और योग्यता पर आधारित थी:
प्रारंभिक स्वरूप: ऋग्वेद के प्रारंभ में केवल 3 मुख्य कर्म-वर्ग थे (ब्राह्मण, क्षत्रिय, और विश/वैश्य)। बाद में उत्पादन और सेवा की आवश्यकता बढ़ने पर 'शूद्र' (श्रमिक) वर्ण जुड़ा। यह वर्ग ब्राह्मण और क्षत्रियों में से ही जन्मा।
लचीलापन (Flexibility): ऋग्वैदिक काल में एक ही परिवार के लोग अपनी योग्यतानुसार अलग-अलग वर्ण चुन सकते थे। जैसे राजा विश्वामित्र अपने तप से ब्राह्मण बने।
वर्ण का 'जाति' में परिवर्तन और विकृति
एक ही तरह के कर्म करने वाले समाज बने: वैदिक काल के बाद, जब लोगों ने पीढ़ियों तक एक ही पेशा अपनाया, तो कर्म की जगह 'जन्म' ने ले लिया।
स्वतंत्रता का अंत: कर्म बदलने की आजादी छिनते ही वर्ण व्यवस्था रूढ़ होकर 'जाति व्यवस्था' में बदल गई।
सामाजिक बुराइयां: जन्म-आधारित व्यवस्था से समाज में ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी कुरीतियों ने जन्म लिया।
अंग्रेज काल: ब्रिटिश शासन में कानूनों और गणनाओं के जरिए जातियों का विभाजन और अधिक गहरा हो गया।
भगवान श्रीकृष्ण और शास्त्रों के अनुसार वर्णों का निर्माण गुण और कर्म (गुणकर्मविभागश:) के आधार पर हुआ था, जन्म से नहीं। जन्म से हर मनुष्य समान पैदा होता है, उसके संस्कार और कर्म ही उसका वास्तविक वर्ण तय करते हैं। लेकिन वर्तमान में हिंदू समाज की यह कठोर और कड़वी सचाई है कि 4 वर्णों में विजाजित हजारों जातियां हो चली हैं जिन्हें समय समय पर राजनीतिज्ञों ने अपने हित में विभाजित या एक करके सत्ता का सुख पाया है।
