यही तो हमारा ताजमहल है
लघुकथा
मंगला रामचंद्रन
'यही तो हमारा ताजमहल है.... गाते-गुनगुनाते उसके मुस्कुराते चेहरे पर शिकन की कोई रेखा नहीं। पच्चीस-छब्बीस वर्षीय वह दर्जी युवक और उसके साथ खड़ी उसकी सलोनी पत्नी। दोनों परस्पर मदद करते हुए एफ.एम. बैंड पर फिल्मी गीत सुनते हुए अपने आप में खुश और मशगूल।
'कभी आगरे का ताजमहल देखा है?' मैं पूछना चाह रही थी, पर उन दोनों के चेहरे पर चढ़ी प्रसन्नता की परत को नोंचने का साहस नहीं हुआ। वह युवक मेरे घर के करीब रहता था और नए कपड़ों की सिलाई के अलावा पुराने कपड़ों को भी ठीक कर देता था।
मैं अपनी सुविधा से उसके पास काम लेकर जा पाती थी। दस बाय आठ फुट का एक कमरा, जिसमें लगभग पाँच फुट के बाद एक परदा लगा है, यानी दो कमरे आठ बाय पाँच फुट के बन गए। सामने के हिस्से में एक टेलरिंग मशीन, कुर्सी व हँगर टाँगने व सिले कपड़े रखने के लिए दीवार में ताक बने हुए थे।
वहीं खड़े-खड़े उसे दर्जी का कपड़ा दिखाना, समझाना क्या और कैसे सिलना, सभी कुछ बताना होता। तब बाकी ग्राहक और साथ आए व्यक्तियों को रास्ते पर इंतजार करना पड़ता।
बहुत दिनों तक मुझे मालूम ही नहीं था कि उसका विवाह हो गया है और पत्नी साथ में है। मैं तो यही समझे हुए थी कि वह उसकी दुकान है और घर कहीं और है।
एक दिन उसकी पत्नी कपड़ों में तुरपन, बटन आदि करते हुए पति को परदे के पीछे से पकड़ाने लगी, तभी मैं चौंक गई। परदे के पीछे इतनी-सी तंग जगह में भयंकर गर्मी और बहते हुए पसीने के साथ वह काम कर रही थी!
मुझसे रहा न गया 'पर्दे की क्या जरूरत है, कमरे से निकाल दो तो वह आराम से काम कर सकती है। ऐसे तो घुटन होती होगी?'
पत्नी तो एक लजीजी हँसी हँसकर रह गई। युवक ने अपने जवाब से मुझे एक और आश्चर्य का झोंका दिया - मैडम, वह केवल एक कमरा नहीं है। पूरा घर-संसार है, रसोई है और घर संसार तो अपने लिए होता है, वरना लुगाई को पर्दे में बिठाने के लिए थोड़े यह कपड़ा इस दीवार से उस दीवार तक बाँधा है।
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'कभी आगरे का ताजमहल देखा है?' मैं पूछना चाह रही थी, पर उन दोनों के चेहरे पर चढ़ी प्रसन्नता की परत को नोंचने का साहस नहीं हुआ। वह युवक मेरे घर के करीब रहता था और नए कपड़ों की सिलाई के अलावा पुराने कपड़ों को भी ठीक कर देता था।
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वहीं खड़े-खड़े उसे दर्जी का कपड़ा दिखाना, समझाना क्या और कैसे सिलना, सभी कुछ बताना होता। तब बाकी ग्राहक और साथ आए व्यक्तियों को रास्ते पर इंतजार करना पड़ता।
बहुत दिनों तक मुझे मालूम ही नहीं था कि उसका विवाह हो गया है और पत्नी साथ में है। मैं तो यही समझे हुए थी कि वह उसकी दुकान है और घर कहीं और है।
एक दिन उसकी पत्नी कपड़ों में तुरपन, बटन आदि करते हुए पति को परदे के पीछे से पकड़ाने लगी, तभी मैं चौंक गई। परदे के पीछे इतनी-सी तंग जगह में भयंकर गर्मी और बहते हुए पसीने के साथ वह काम कर रही थी!
मुझसे रहा न गया 'पर्दे की क्या जरूरत है, कमरे से निकाल दो तो वह आराम से काम कर सकती है। ऐसे तो घुटन होती होगी?'
पत्नी तो एक लजीजी हँसी हँसकर रह गई। युवक ने अपने जवाब से मुझे एक और आश्चर्य का झोंका दिया - मैडम, वह केवल एक कमरा नहीं है। पूरा घर-संसार है, रसोई है और घर संसार तो अपने लिए होता है, वरना लुगाई को पर्दे में बिठाने के लिए थोड़े यह कपड़ा इस दीवार से उस दीवार तक बाँधा है।
