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Written By WD

सबकी आँखों में सपने थे

साहित्य
डॉ. शिव ओम 'अंबर'
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उस अल्हड़ को गृहलक्ष्मी की
गतिविधियाँ सिखलाना है
अब उसको पल्लू सर पे रख
संध्यादीप जलाना है।

सबकी आँखों में सपने थे
सबकी आँखें गीली हैं,
दो ल़फ़्जों में इस बस्ती का
इतना ही अफ़साना है।

वो अक्सर करता रहता है
चर्चाएँ आदर्शों की,
वो शायद दानिशमंदों की
नज़रों में दीवाना है।

जिसमें टूटे फ्रेमों वाली
कुछ धुँधली तस्वीरें हैं,
हर दिल की बैठक के नीचे
इक अंधा तहख़ाना है।

अंबर जी पढ़नी हैं ग़ज़लें
तुमको इस कोलाहल में,
अंगारों पे रजनीगंधा की
कलियाँ बिखराना है।

साभार : कथाबिंब
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WD