Poem | तुम शायद ना आओ लौटकर
फाल्गुनी
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अब कभी ना आओ लौटकर
चिखती सड़कों पर
जलते-बूझते इश्तहारों की तरह,
खड़ी रहूँगी हमेशा
विज्ञापनों से अटी
बोझ से दबी दीवारों की तरह,
शायद किसी दिन
चस्पा किए जाओ
तुम मुझ पर
परमानेन्टली..
ऑनेस्टली..।
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