जो हम होना चाहते हैं
ओमीश परुथी
जो हम हैंऔर जो होना चाहते हैंजैसे हम हैंऔर समाज में जैसे दिखना चाहते हैंदोनों के बीचजम्हाई लेता एक अंतराल हैजिसको भरने की कवायद भरबनकर रह गई है जिंदगी हमारीयह रात-दिन की भाग-दौड़यह सुबह-शाम की चिंता, लाचारी।तोहफे, तमगे पाने कीतख्तियाँ लगाने कीमन में खुदी लालसाएँ भारीमंच, सभा अथवा क्लब के नेपथ्य मेंचुपके-चुपके खेलती आत्मविज्ञप्ति अतिचारी।कारीगर कला के या प्रतिष्ठा के पुजारीऔरों की दृष्टि से खुद को देखने की बीमारीयही, सब यही बची है जिंदगी हमारीकुइया की ठंडक, सागर-सी खारी।