Hindi Poem | जो हम होना चाहते हैं
ओमीश परुथी
ND
और जो होना चाहते हैं
जैसे हम हैं
और समाज में जैसे दिखना चाहते हैं
दोनों के बीच
जम्हाई लेता एक अंतराल है
जिसको भरने की कवायद भर
बनकर रह गई है जिंदगी हमारी
यह रात-दिन की भाग-दौड़
यह सुबह-शाम की चिंता, लाचारी।
तोहफे, तमगे पाने की
तख्तियाँ लगाने की
मन में खुदी लालसाएँ भारी
मंच, सभा अथवा क्लब के नेपथ्य में
चुपके-चुपके
खेलती आत्मविज्ञप्ति अतिचारी।
कारीगर कला के या प्रतिष्ठा के पुजारी
औरों की दृष्टि से खुद को देखने की बीमारी
यही, सब यही बची है जिंदगी हमारी
कुइया की ठंडक, सागर-सी खारी।
