कल रात एक सपना देखा
-अरुण चन्द्र रॉय
प्रियेबहुत दिनों बादकल रात मुझे आई नींदऔर नींद में देखा सपनासपना भी अजीब थासपने में देखी नदीनदी पर देखा बाँधदेखा बहते पानी को ठहरानदी की प्रकृति के बिल्कुल विपरीत मैं तो डर गया थारुकी नदी को देख करसपने में देखा कई लोगहंस-हंस कर लोट-पोट होते लोगरुकी हुई नदी के तट पर जश्न मानते लोगनदी को रुके देख खुश हो रहे थे लोगठोंक रहे थे एक-दूसरे की पीठजीत का जश्न मन रहे थे लोगप्रियेरुकी नदी पर हंसतेभयावह लग रहे थे लोगसपने में देखा सांपकाला और मोटा सांपरुकी नदी के ताल में पलता यह सांपहंसते हुए लोगों ने पाल रखा है यह सांपमैं तो डर गया थामोटे और काले सांप को देख कर प्रियेमैं तोड़ रहा था यह बांधखोल रहा था नदी का प्रवाहमारना चाहता था काले और मोटे सांप कोताकिनदी रुके नहींनदी बहे, नदी हंसेनदी हंसे एक पूर्ण और उन्मुक्त हंसीऔर लहरा कर लिपट जाए मुझ से प्रियेकल रात सपने में हंसी थी नदीमुझसे लिपट कर एक उन्मुक्त हंसीऔर नदी बोलीकोई पूछे तो कहनारुकना नदी की प्रकृति नहीं।