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तीन तलाक पर कविता : तीन तलाक गुनाह है...

Updated: शनिवार, 26 नवंबर 2022 (10:59 IST)
*आखिरकार किसी ने समझी..
मेरे मन की बात...
कोई है जो समझ गया है..
नारी के जज़्बात...
 
*तीन तलाक की लटक रही थी...
मेरे सिर तलवार...
अब आई है हाथ में..
माझी के पतवार....
 
*बुर्के से शिकवा नहीं..
परम्परा है मेरी...
पारम्परिक प्रताड़ना के 
खिलाफ है रणभेरी....
 
*स्त्री हूं मैं, गर्व मुझे है..
नहीं ये कोई गुनाह है..
आज समझ लें सभी स्वयंभू..
तीन तलाक गुनाह है...
 
*सायरा,आफरीन, अतिया,इशरत..
और गुलशन की जीत....
डर नहीं प्रेम दे देते मुझको...
तो तुम ही जाते जीत...।।
लेखक के बारे में
ज्योति जैन
लेखिका स्वतंत्र तथा वामा साहित्य मंच-इंदौर की सचिव हैं।.... और पढ़ें

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