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हिन्दी कविता : इंसानियत

Updated: गुरुवार, 20 जुलाई 2017 (17:20 IST)
एक कुत्ता मेरे पास आया,
बोला तुम इंसान हो।
 
मैंने कहा, तुम्हें कोई शक है,
बोला शक नहीं, मुझे यकीन है।
 
तुम्हारे चेहरे पर इंसान का नकाब है
इंसानियत का तुम्हारे पास कोई हिसाब है।
 
सुबह उठते ही सारा अपने पेट में ठूंस लेते हो,
ऑफिस जाकर दूसरों से फिर घूस लेते हो,
रात को शराब पीकर नोचते हो जीवित मांस,
गला काटकर अपने भाई का,
छीन लेते हो उसकी सांस।
 
काली कमाई से विशाल अट्टालिकाएं बनाते हो,
भगवान को पांच रुपए का प्रसाद चढ़ाकर मूर्ख बनाते हो,
देश को चंद सिक्कों में दुश्मनों को बेच आते हो,
फिर भी गर्व से अपने को इंसान कहलवाते हो।
 
हम कुत्तों में न जात है, न पात है,
हमारी पूंजी हमारे जज्बात हैं,
जिसका हम नमक खाते हैं,
जान उसके लिए लड़ा जाते हैं,
उसके बाद भी हम कुत्ते कहलाते हैं।
 
हम चंद सिक्कों में,
अपना स्वाभिमान नहीं बेचा करते हैं,
आखिरी दम तक मालिक से वफा करते हैं।
 
अब तुम खुद फैसला करो,
हम कुत्ते होकर भी इंसानियत,
अपने अंदर पाले हैं,
तुम इंसान का मुखौटा लगाकर,
कुत्तापन और हैवानियत के पुतले हो।
 
लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें
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