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किसान आंदोलन पर कविता : एक शाश्वत टीस

Updated: रविवार, 18 जून 2017 (15:40 IST)
डॉ.रामकृष्ण सिंगी 
 
टैंकरों से बहा जब सड़कों पर दूध,
वेदना से भर गया मन, आंखें डबडबा गईं। 
छा गई हर एक दिल में एक अबोली खिन्नता,
हमारी बेबसी पर हजार लानतें बरसा गई।।1।।
 
 
जो बह रहा था सड़कों पर, 
वह निरीह पशुओं से निचोड़ा रस था। 
माता के दूध के बाद, प्रकृति का दिया हुआ अमृत,
शिव जटा / विष्णु चरण से गंगा सा छोड़ा रस था ।। 2 ।।
 
कारण जो भी रहा हो उसके पीछे,
पर उसकी यों परिणति बहुत दुखद थी। 
हाय-हाय कर उठा था हर हृदय,
हर आत्मा भी दुखी बेहद थी  ।।3।।
 
अब जब भी याद आएंगे वे दृश्य फिर,
उस क्षणिक निर्मम नादानी की याद दिलाएंगे। 
हम मन ही मन कोसते रहेंगे अपनी कायर सभ्यता को। 
पछतावे की शाश्वत टीस से शायद ही उबर पाएंगे ।। 4 ।।
लेखक के बारे में
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्‍यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय.... और पढ़ें
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