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प्रेरक कविता: तुम कमजोर नहीं हो

Updated: बुधवार, 4 फ़रवरी 2026 (16:02 IST)
मैं जानता हूं
सोने की देहलीज के भीतर
कितनी काली रातें बसती हैं
जहां धन की चकाचौंध में
मानवता सबसे पहले मरती है
 
तुम्हारा दुख
किसी अभाव का नहीं
अपमान की उस निरंतर वर्षा का है
जो हर दिन
तुम्हारे मौन को भिगो देती है
 
जिस घर में
संबंधों का मूल्य सिक्कों से आंका जाए
वहां प्रेम
सबसे असहाय हो जाता है
और पति
केवल एक पद रह जाता है
संवेदना नहीं
 
पर सुनो 
तुम कमजोर नहीं हो
तुम्हारा सहना
कायरता नहीं
तुम्हारी शक्ति का प्रमाण है
 
तुम्हारी आंखों में
अब भी उजाले की जिद है
तुम्हारे भीतर
अब भी एक स्त्री जीवित है
जो हार मानना नहीं जानती
 
मैं चाहता हूं
तुम स्वयं को दोषी मानना छोड़ो
किसी और की हीनता
तुम्हारा अपराध नहीं होती
 
जिस दिन
तुम अपने दुख को
अपनी नियति मानने से इनकार करोगी
उसी दिन
तुम्हारा जीवन
नई दिशा ले लेगा
 
सत्य तुम्हारे साथ है
छाया की तरह नहीं
बल्कि उस भरोसे की तरह
जो तुम्हें खड़ा होना सिखाए।
 
रोना यदि जरूरी हो
तो रो लो
पर टूट मत जाना
क्योंकि जो स्त्री
इतना सह सकती है
वह एक दिन
अपने लिए रास्ता भी बना लेती है
 
तुम्हारा जीवन
किसी के धन की दया पर नहीं
तुम्हारे साहस की शर्तों पर चलेगा
बस
खुद पर विश्वास करना मत छोड़ना
 
सुनो
अब प्रश्न केवल सहने का नहीं
चुनने का है
रिश्तों की परछाईं
या अपने स्वाभिमान का सूर्य
 
मैं जानता हूं
यह निर्णय सरल नहीं
क्योंकि हर स्त्री को सिखाया गया है
रिश्ते बचाना पुण्य है
चाहे आत्मा ही क्यों न टूट जाए
 
पर सुनो
जो संबंध तुम्हें
हर दिन छोटा करता जाए
तुम्हारी गरिमा को
मोलभाव की वस्तु बना दे
वह संबंध नहीं
एक जंजीर होता है
 
तुम बाहर कैसे निकलोगी
यह किसी एक कदम का नाम नहीं
यह धीरे धीरे
अपने भीतर उठ खड़े होने की प्रक्रिया है।
 
पहले स्वयं से यह स्वीकार करो
कि पीड़ा तुम्हारी नियति नहीं
फिर किसी विश्वास योग्य आवाज को
अपने दुख का साक्षी बनाओ
मौन सबसे बड़ा शत्रु होता है।
 
डरो मत
आगे बढ़ो
कमजोर मत बनो
यह आत्मरक्षा का 
प्रथम साहस है
 
यदि रिश्ता
तुम्हें मनुष्य नहीं रहने देता
तो उसे निभाना धर्म नहीं
और यदि स्वाभिमान बचाने के लिए
कुछ दूरी आवश्यक हो
तो वह पलायन नहीं
स्वस्थ चयन है
 
याद रखना
जो तुम्हें सच में चाहता है
वह तुम्हारी चुप्पी नहीं
तुम्हारी मुस्कान का रक्षक बनेगा
 
मैं यह नहीं कहता
तुरंत सब छोड़ दो
मैं केवल इतना कहता हूं
अपने अस्तित्व को
आखिरी पायदान पर मत रखो
 
कभी कभी
रिश्ते छोड़ने से नहीं
अपने आप को बचाने से
जीवन आगे बढ़ता है
 
और जिस दिन
तुम अपने निर्णय को
अपराध नहीं समझोगी
उसी दिन
तुम सच में मुक्त हो जाओगी
 
देखना एक दिन 
सभी
तुम्हारे साथ होंगे
निर्णय में नहीं
बल्कि उस विश्वास में
कि तुम स्वयं को चुन सकती हो।

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लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें

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