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Written By ND

विमल मित्र

अपने दुःखों को सुख में पिरोकर प्रेम बांटने वाला साहित्यकार

NDND
- डॉ. रमेश सोन

समुद्र के चाहे सौ पर्यायवाची लिख दें, फिर भी समुद्र को समुद्र कहने से जो अर्थ की संपूर्णता, गंभीरता और सौंदर्य की अभिव्यक्ति होती है वह वजन पर्याय के जरिए कहां आ पाता है। ठीक, कुछ इसी तरह की बात विमल दा के संदर्भ में है। बांग्ला साहित्य के संदर्भ में विमलमित्र का पर्याय कोई नहीं है। हिन्दीभाषी पाठकों ने उन्हें इतना प्यार और सम्मान दिया है कि उनकी अंतिम इच्छा इनके बीच दोबारा जन्म लेने की रही थी। आज भी उनके प्रशंसकों और पाठकों की संख्या कम नहीं है।

हिन्दी और बांग्ला के लोकप्रिय कथाकार विमल मित्र वह नाम है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उन्होंने सन्‌ 1938 में कलकत्ता वि.वि. से बांग्ला साहित्य में एम.ए. की उपाधि ली। 18 दिसंबर 1912 को कलकत्ता में जन्मे, इस बेजोड़ कथाकार ने रेलवे में विभिन्न पदों पर नौकरी की। जून 56 में डिप्टी चीफ कंट्रोलर के पद से इस्तीफा दे दिया और स्वतंत्र लेखन करने लगे। उन्होंने हिन्दी साहित्य को लगभग साढ़े तीन दशकों तक लिखते हुए 60 से अधिक उपन्यास और कहानी संग्रह दिए हैं।

स्वभाव से फक्कड़ आर्थिक अभावों से जूझते विमल दा ने देश के दूरदराज अंचलों की यात्राएं कीं और वहीं से ढेर सारे कथानक और चरित्रों की पूंजी अर्जित की थी। उनके 'सुरसतिया' को कौन नहीं जानता? 'मुजरिम हाजिर है' और 'इकाई, दहाई, सैकड़ा' को दूरदर्शन पर देखने वाले लाखों दर्शकों की स्मृति में, आज भी उनके कई पात्र जीवित हैं। सभी को यह अहसास होता है जैसे विमल दा ने उनकी कहानियां लिख दी हों, वे कहानियां जो कहीं उनके गहरे अतीत में गुम हो चुकी थीं। वह दर्द, जो एक मुकाम पर पहुंचकर चट्टान में तब्दील हो चुका था, संवेदनाएं मर चुकी थीं। यदि कहीं कुछ बचा था, तो वे स्मृतियां थीं। गुरुदत्त की अमर रचना 'साहब, बीवी और गुलाम' की छोटी बहू को कौन भूल सकता है? ऐसे और भी कई पात्र हैं, जो भारतीय जनमानस के जीवन का हिस्सा बने हुए हैं। इन सभी को उन्होंने अपनी रचनाओं में लिखा है।

हिन्दी पाठकों को उनकी जो रचनाएं अनुवादित होकर पढ़ने को मिली, उनमें 'साहब बीवी और गुलाम', 'खरीदी कौड़ियों के मोल' (दो-खंड), 'इकाई, दहाई, सैकड़ा', 'बेगम मेरी विश्वास' (दो खंड), 'दायरे के बाहर', 'मैं', 'राजा बादल', 'चरित्र', 'गवाह नंबर 3', 'वे दोनों', 'काजल', 'कन्यापक्ष', 'रोकड़ जो नहीं मिली,' 'चलो कलकत्ता,' 'हासिल रहा तीन', 'तपस्या', 'राग भैरवी', 'सुबह का भूला' जैसी कृतियां उल्लेखनीय हैं।

डॉ. धर्मवीर भारती के नाम लिखवाए गए एक पत्र में उन्होंने अपने अतीत को याद करते हुए लिखा था 'मेरे माता-पिता, बचपन से ही कहा करते थे कि मेरा यह लड़का निकम्मा और फालतू है। मेरे भाई और बहन भी कहते हैं कि मैं अपदार्थ हूं, मेरा भविष्य अंधकारमय है।' स्कूल के छात्र-शिक्षक भी यही कहते। जब यूनिवर्सिटी में गया, वहां भी यही बातें थीं। जब एम.ए. किया तो यह जानने की मन में तीखी चाह जगी कि 'मैं कौन हूं?' उस्ताद अब्दुल करीम खां सन्‌ 1936 में कलकत्ता आए थे। उनका गाना सुनकर मैं उपन्यास-शैली सीख सका, लेकिन, मैं बेहद लजीला था। इसलिए आम श्रोताओं के सामने खुद गाना संभव नहीं हो सका। मैंने सोचा कि 'जिस देश में मेरा जन्म हुआ है, उस देश पर मैं उपन्यास लिखूंगा। तभी से उन्होंने संकल्प लेकर लिखना शुरू कर दिया था।

आश्चर्य तो इस बात का है कि यह, वह युग था, जब सोलह साल की उम्र तक के लड़के-लड़कियों को उपन्यास पढ़ने की अनुमति नहीं थी। इसलिए विमल दा को भी नेशनल लायब्रेरी जाकर देश का अतीत और इतिहास जानना पड़ा था। वे डाक से कहानी भेजते। कई कहानियाँ छपतीं और कई संपादक के सधन्यवाद पत्रों के साथ वापस लौट आती थीं।

'साहब, बीवी और गुलाम' से विमल दा को काफी ख्याति मिली, यह सभी जानते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि उन्हें आलोचनाओं का शिकार भी होना पड़ा था। उनके शब्दों में कहें तो जब 'साहब और बीवी, और गुलाम' लिखा तो सबने मेरी निंदा की, सबने लानतें भेजीं। इतनी निंदा हुई कि मैंने अपनी पत्नी से अनुमति लेकर नौकरी छोड़ दी.. और तब कलकत्ते के 300 साल की कथा लिखने का विचार किया।

हिन्दी ने उन्हें बहुत प्यार दिया। हिन्दी के पाठकों ने उन्हें सही मायने में जाना और सम्मानित किया था। उन्होंने लिखा है 'हिन्दी में जब साहब, बीवी और गुलाम बिना मेरी अनुमति के निकला, तब मैं विह्वल रह गया। अनेक लोगों ने कोशिश की कि मुझे कोई पुरस्कार न मिले। अखबारों में लिख-लिखकर मुझे छोटा करने की कोशिश की गई। मैं निराश नहीं हुआ। मेरे पास आज से 200 बरस पहले वॉल्टेयर द्वारा लिखी यह सांत्वना थी कि लेखक विफल हुआ, तो मिलेगी उसे उपेक्षा और सफल हुआ तो उसे मिलेगी घृणा। मैंने इसी घृणा को पाठकों का प्यार और प्रेरणा माना और लिखता चला गया।

भारतीजी के शब्दों में 'समय गंध ओ' कलिकातार कथा-पुरुष के लेखक विमल दा एक बेजोड़ कथाकार थे। उन्हें सर्वाधिक प्यार हिन्दी से मिला। बांग्ला में तो उनके असंख्य पाठक थे ही, हिन्दी में जब उनका कथा-साहित्य विशेषकर 'खरीदी कौड़ियों के मोल, 'साहब, बीवी और गुलाम', 'बेगम मेरी विश्वास', आए तो हिन्दी के विशाल पाठक समूह ने उन्हें सर पर बैठा लिया था। यह बात और है कि उनका अपना निजी संसार दुखों से भरा था और यही वजह है कि उन्होंने अपने लेखन का लक्ष्य बताते हुए कहा था 'संपूर्ण मानव जीवन दुःख से पूर्ण है, मनुष्य दुःख लेकर पैदा होता है और दुःख लेकर मर जाता है। इसका कहीं अंत नहीं है। अतः ऐसे दुःखी मनुष्य को थोड़ी मानसिक शांति देना यदि साहित्य के जरिए संभव हो जाए, तो इसे मैं अपनी बड़ी उपलब्धि मानूंगा। मानव मन को अनादिकाल से प्रेम की प्यास रही है। यह प्रेम मैं देना चाहता हूं।'... और वे अपने जीवन के 80 बरस तक कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से दुःखी मानव समुदाय को प्रेम बांटते रहे और प्रेम पाते रहे।