हिन्दी को सरल रहने दीजिए

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यह सेमिनार 1982 या 83 में हुआ था पर आजतक इतने श्रद्धेय विद्वान के सुझावों पर अगर सेकेंडरी कक्षा का पाठयक्रम निर्धारित करने वाली समिति ने ध्यान नहीं दिया तो क्या हम सब की आवाजे भी नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर नहीं रह जाएगी?

सन 2000 में महाराष्ट्र बोर्ड की कक्षा बारहवीं के हिंदी के पाठयक्रम की एक सुप्रसिद्ध कविता की बानगी देखें -

लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरंतर,
छोड़ रहे हैं जंग के विक्षत वक्षस्थल पर!
शत शत फेनोच्छवासित, स्फीत फुत्कार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अंबर!
मृत्यु तुम्हारा गरल दंत, कंचुक कल्पांतर,
अखिल विश्व ही विवर, वक्र कुंडल, दिक्मंडल!
शत सहस्त्र शशि, असंख्य ग्रह उपग्रह, उड़गण,
जलते, बुझते हैं स्फुलिंग से तुम में तत्क्षण,
अचिर विश्व में अखिल दिशावधि, कर्म, वचन, भव,
तुम्हीं चिरंतन, अहे विवर्तन हीन विवर्तन!

यह सुप्रसिद्ध छायावादी कवि श्री सुमित्रानंदन पंत की सुपरिचित कविता निष्ठुर परिवर्तन है। इसमें संदेह नहीं कि कविता में बिंब और प्रतीकों का अद्भुत संयोजन है, अनुप्रास अलंकार की छटा है पर ऐसी कविता पढ़ाने से पहले जिन्हें हम पढ़ा रहे हैं, उनकी पात्रता देखना भी आवश्यक है!

ऐसी कविताओं से हिन्दी की स्थिति में परिवर्तन सचमुच निष्ठुर होने की संभावना ही अधिक हैं। बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी इसे पढ़ते हुए त्राहि-त्राहि कर उठते हैं।

यह बात जब मैंने यहां राष्ट्रभाषा महासंघ के राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में कही, (जहां हर वक्ता अंग्रेजी को अपदस्थ करने के लिए क्या रणनीति अपनाई जाए, इसकी चर्चा में अपनी ऊर्जा ज्यादा खपा रहा था यानी आप बैंक में हिन्दी में हस्ताक्षर करें, अपने नामपट्ट हिन्दी में लिखें, थैंक्यू की जगह धन्यवाद, सॉरी की जगह क्षमा करें, गुडमॉर्निंग की जगह सुप्रभात बोलें वगैरह वगैरह) तो मुझपर भी हिन्दी प्रेमी श्रोता बरस पड़े थे।

एक सज्जन ने तो छूटते ही यह भी कहा कि आपकी तो मातृभाषा पंजाबी हैं, ख़ामख़्वाह हिन्दी के लिए इतना परेशान क्यों होती है?

दरअसल हमारी पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि हमारी नई पीढ़ी कैसे हिन्दी की ओर आकर्षित हो, हिन्दी भाषा से उसे विरक्ति न हो। पाठयक्रम निर्धारित करने वाले लगभग सभी सदस्य हिन्दी बेल्ट से आते हैं और वे छात्रों की रुचि को अपने चालीस-पचास वर्ष पुराने मापदंड से ही मापते हैं। बदलता हुआ समय उनकी पकड़ से बाहर है।

वे सुमित्रानंदन पंत को पढ़ाए बिना दुष्यंत कुमार, रघुवीर सहाय, धूमिल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना तक पहुंच ही नहीं सकते। निष्ठुर परिवर्तन ही पढ़ाना है तो एम.ए. के कोर्स में पढ़ाएं, और बारहवीं में पंत जी को ही पढ़ाना है तो छात्र पंत जी की दो लड़के जैसी आसान कविता क्यों नहीं पढ़ सकते -

मनुज प्रेम से जहां रह सके, मानव ईश्वर,
और कौन-सा स्वर्ग चाहिए तुझे धरा पर!

ऐसा नहीं हैं कि हिन्दी में आज की नई पीढ़ी के समझ में आने लायक कविताएं नहीं हैं, वे बखूबी हैं पर हिन्दी का पाठयक्रम तय करनेवालों को, हिन्दी साहित्य पढ़ाने वाले प्राध्यापकों को जब तक संस्कृतनिष्ठ, क्लिष्ट हिन्दी की तत्सम-बहुल पंक्तियां नहीं मिलती, उन्हें संभवतः कविता या गद्य में भाषागत सौंदर्य दिखाई नहीं देता।

सुधा अरोड़ा|
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कलकत्ता में मैथिलीशरण गुप्त की 100 वीं जन्म शताब्दी पर भारतीय संस्कृति संसद (या भारतीय भाषा परिषद) ने एक सेमिनार आयोजित किया था जिसमें वयोवृद्ध साहित्यकार पंडित श्री नारायण चतुर्वेदी ने इसी समस्या पर दस बारह पृष्ठों का एक लंबा आलेख लिखा था, जिसमें उन्होंने पाठयक्रम की एक पूरी की पूरी कविता का उद्धरण देते हुए बताया था कि कैसे दसवीं कक्षा की एक छात्रा उनके पास बड़ी आशाएं लेकर वह कविता समझने के लिए आईं पर उन्हें अफसोस जाहिर करना पड़ा।
संभवतः वह सोचते होंगे कि ऐसे सहज सपाट गद्य और ऐसी सीधी सादी कविता को पाठयक्रम में क्या पढ़ाना जो बिना प्राध्यापक के भी समझ में आ जाए।



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