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गाँधीजी को श्रद्धांजलि

शनिवार,जनवरी 12, 2008
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दुनिया को निडरता और सत्‍य का संदेश देने वाले बापू ने भी युवावस्‍था में भय और असत्‍य का सामना किया है। अपने व्‍यक्तित्‍व की कमियों को भी उन्‍होंने बड़ी सहजता से स्‍वीकार किया। अपनी आत्‍मकथा ‘सत्‍य के मेरे प्रयोग’ में उन्‍होंने कई बातें...
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महासंग्राम का शंखनाद

शनिवार,जनवरी 12, 2008
संभवतया यह आप लोगों के लिए मेरा अंतिम भाषण है। यदि सरकार मुझे कल पदयात्रा की अनुमति भी दे देती है तब भी साबरमति नदी के पावन तट पर यह मेरा अंतिम भाषण ही होगा। हो सकता है कि इस स्‍थान पर यह मेरे जीवन के अंतिम
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मानव शरीर

शनिवार,जनवरी 12, 2008
मानव शरीर की गूढ़ संरचना को विस्‍तार से जानने के पूर्व ‘स्‍वास्‍थ्‍य’, इस शब्‍द का अर्थ समझना आवश्‍यक है। वह व्‍यक्ति स्‍वस्‍थ है, जिसका शरीर सभी बीमारियों से मुक्‍त है, जो बिना थकान के...
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टॉल्स्टॉय की उनकी पुस्तक द्वारा और उनके साथ के थोड़े से पत्र व्यवहार से; रस्किन की उनकी एक ही पुस्तक 'अनटु धिस लास्ट' से, जिसका गुजराती नाम मैंने 'सर्वोदय' रखा है और राजचंद्रभाई की उनके साथ के परिचय से।' इतना ही नहीं
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तॉल्सतॉय और गाँधी

शनिवार,जनवरी 12, 2008
तॉल्सतॉय ने 1893 में एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम था 'ईश्वर का साम्राज्य तुम्हारे अंदर ही है।' यह पुस्तक गाँधी को एक मित्र ने 1894 में दी। गाँधी ने उसे पढ़ा लेकिन उसका बुखार गाँधी पर चढ़ा 1906 में।
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गाँधी के वाक्य 'द ब्यूटीफुल ट्री' को जस का तस लेकर डॉ. धर्मपाल ने अपना शोध शुरू किया और अँगरेजों और उससे पूर्व के समस्त दस्तावेज खंगाले। जो कुछ भारत में मिला उन्हें संग्रहालयों और ग्रंथालयों से लिया
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भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के जन्मदिवस (2 अक्टूबर) को पहली बार 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के रूप में मनाया जा रहा है। इससे यह सिद्ध होता है कि गाँधी सिर्फ आजादी के पहले ही नहीं बल्कि आजादी के 60 वर्ष बाद भी उतने ही सामयिक हैं।
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गाँधी की मृत्यु को भी 60 वर्ष होने को आए परंतु हममें से अधिकांश अभी भी उनका मूल्यांकन एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करते हैं जो सत्य और अहिंसा को जीवन का उद्देश्य बताता था। परंतु गाँधी दर्शन के अनुसार ये उद्देश्य भर नहीं, यही जीवन है।
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बहुमूल्‍य प्रार्थनाएँ

सोमवार,दिसंबर 24, 2007
मैं आप सभी से यह कहना चाहता हूँ कि प्रयासों के लिए दुआएँ करें और मेरे साथ और मेरे लिए प्रार्थना करें। आज के पहले भोजन से ही उपवास शुरू होगा। यह समय कितना होगा और मैं पानी बिना नमक और नींबू के साथ पियूँगा या फिर बिना इसके ही यह अनिश्चित है।
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सेहत की रक्षा के लिए स्वास्थ्य के नियमों के अनुसार यह उपवास है, उपवास अगर शरीर को कष्ट देने के लिए किया गया हो तो वह गलत है और बीमार पड़ना स्वाभाविक है। इस तरह के उपवासों में एक चीज की आवश्यकता होती है अहिंसा पर विश्वास मत करो।
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बा के नाम बापू का पत्र

सोमवार,दिसंबर 24, 2007
मैं जानता हूँ कि तुम मेरे साथ रहने की इच्‍छुक हो। मुझे लगता है कि हम दोनों को अपने-अपने कार्य में लगे रहना चाहिए। फिलहाल यह उचित होगा कि तुम जहाँ हो वहीं ठहरो। यदि तुम सभी बच्‍चों को...
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नेहरू के नाम बापू का पत्र

सोमवार,दिसंबर 24, 2007
धामी के लोगों का मार्गदर्शन करने की बजाए मैंने उन्‍हें तुम्‍हारे पास भेज दिया है। मुझे लगता है कि मेरे हस्‍तक्षेप के बिना ही तुम इस काम को कर लोगे। राज्‍यों को अलग रखने और काँग्रेस की अवहेलना...
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वैष्‍णव जण तो

सोमवार,दिसंबर 24, 2007
वैष्‍णव जण तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाणे रे पर दुक्‍खे उपकार करे तोए, मन अभिमान न आणे रे।
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आज भी प्रासंगिक हैं गाँधी

सोमवार,दिसंबर 24, 2007
यह कोई जरूरी तो नहीं है कि महात्मा गाँधी को हम केवल गाँधी जयंती या 2 अक्टूबर को ही याद करें। 2 अक्टूबर को तो लालबहादुर शास्त्री को भी याद किया जा सकता है। उनके अलावा अन्य हजारों लोगों का जन्म इस दिन हुआ था।
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'लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूरि। चींटी ले सक्कर चली, हाथी के सिर धूरि॥' यह दोहा हमारे देश भारत की महान विभूति लालबहादुर शास्त्री के व्यक्तित्व पर चरितार्थ होता है। 2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय
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विख्यात मास कम्युनिकेटर मार्शल मैकलूहान ने कहा कि माध्यम ही संदेश है। इस संदेश को उन्होंने कभी गर्म कहा तो कभी संदेश को ही सर्वोपरि बताया। उनके बाद के संचार विशेषज्ञों ने जन आवश्यकता की इस प्रक्रिया पर काफी काम किया। लेकिन भारत के संदर्भ में
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गाँधी मार्ग

सोमवार,दिसंबर 24, 2007
मिल जाती है मूँगफली और भुना हुआ चना गाँधी मार्ग पर बने ओवरब्रिज के नीचे से गुजरते हैं दूसरे रास्ते बिछी हुई हैं रेल पटरियाँ
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एक सफल और सशक्त लोकतंत्र । तभी उत्तरोतर विकास, वृद्धि करता है, जब उस लोकतंत्र का प्रत्येक नागरिक कर्तव्य परायण और अपने मूल अधिकारों एवं दायित्वों के प्रति दृढ़ संकल्पित हो। नागरिकों को इस योग्य बनाने का काम देश के कर्णधार और राष्ट्र के शीर्ष पदों
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दक्षिण अफ्रीका के संस्थापक वास्तुविद् हरमन कालेनबेक (1871-1945) और गाँधीजी मित्रता की मिसाल बन गए। यह 'फ्रैंडशिप डे' से उपजी बाहरी दोस्ती नहीं थी बल्कि पहली मुलाकात में ही अपने भीतर के रंग में रंग लेने वाली दोस्ती थी।
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पुराने सत्य और अहिंसा

सोमवार,दिसंबर 24, 2007
गाँधीवाद भारत के प्रमुख राजनीतिक और आध्यात्मिक नेता मोहनदास करमचंद गाँधी के दृष्टिकोण, केंद्रीय प्रेरणाओं, सिद्धांतों, मान्यताओं और दर्शन का एक अनौपचारिक संदर्भ है। यह उन विचारों और सिद्धांतों का आईना है, जो न केवल बेहतर तरीकों से प्रेरणा, दृष्टिकोण
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मोहनदास करमचंद गाँधी हाड़-माँस का एक ऐसा शख्स था जो एक सदी तक सारी दुनिया पर छाया रहा और आज भी किसी न किसी रूप में हमारे बीच उनकी प्रासंगिकता मौजूद है, भले ही वह 'लगे रहो मुन्नाभाई' जैसी फिल्म ही क्यों न हो।
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प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनके त्यागपत्र की सूचना लोकसभा में देते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। 'उनमें ऊँचे दर्जे की ईमानदारी, आदर्श के प्रति निष्ठा, अंतरात्मा की आवाज सुनने और कड़ी मेहनत करने की आदत है।'
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'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी' ये मैं भी मानता था बहुत लंबे अर्से तक। मैं भी इसे कहता था। अल्पता के बोध के साथ कह सकता हूँ कि तब 'रहहुँ अति ही अचेत' जब कहा करता था कि मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी। धीरे-धीरे मैंने महसूस किया और गौर से सोचें तो
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महात्मा गाँधी ने कहा था- आँख के बदले आँख का प्रतिशोध भरा कानून अगर विश्व में लागू हो गया, तो पूरा विश्व अंधा हो जाएगा। वर्तमान में जब घृणा और बदले की मानसिकता व्यक्तिगत स्तर के ऊपर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आ चुकी है,
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चित्रकारों ने गाँधीजी को रेखाचित्रों में अपनी-अपनी शैली में प्रस्तुत किया है। गाँधीजी का सिर, चश्मा, धोती एवं लाठी मात्र इनके जरिए गाँधीजी को व्यक्त करने के अनूठे प्रयास चित्रकारों
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संत का अंत नहीं होता बल्कि संत देहमुक्त होकर अनंत हो जाता है। आज आदमी, आदमी के बीच नफरत, जाति-जाति के बीच दुश्मनी और घृणा तथा मुल्क-मुल्क के बीच आतंक, तनाव और एक-दूसरे को मिटा देने की कट्टरता व्याप्त है। आखिर इतने सारे धर्म,
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दो अक्टूबर 1904 को मुगलसराय में एक निर्धन परिवार में जन्मे लालबहादुर शास्त्री के व्यक्तित्व व कृतित्व ने सारे देश को विस्मित कर दिया। भौतिकता मनुष्य को उच्च पद पर प्रतिष्ठित नहीं कर सकती। उसको महत्वपूर्ण आसन पर पहुँचाती है, उसकी सरलता, सौम्यता व
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हमने हमीं से गाँधी छीन लिया

सोमवार,दिसंबर 24, 2007
गाँधी से मिली थी आजादी, गाँधी से मिला था स्वाभिमान, गाँधी से मिला था स्वावलंबन, गाँधी से मिला था सर्वधर्म समभाव और गाँधी से मिला था स्वदेशीपन पर गर्व, हमने गाँधी को शरीर से तो खोया ही लेकिन उ
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'प्रकृति का शाश्वत नियम है कि वह नित उतना उपजाती है जितना हमें प्रतिदिन लगता है। यदि प्रत्येक मनुष्य आवश्यकता से अधिक न ले, तो दुनिया में गरीबी रहेगी ही नहीं
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पंडित नेहरू के शब्दों में, 'अत्यंत ईमानदार, दृढ़ संकल्प, शुद्ध आचरण और महान परिश्रमी, ऊँचे आदर्शों में पूरी आस्था रखने वाले निरंतर सजग व्यक्तित्व का ही नाम है- लाल बहादुर शास्त्री।
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कल, आज और कल

सोमवार,दिसंबर 24, 2007
आज नई सदी की पहली गाँधी जयंती है। पुण्यतिथि नौ माह पहले गुजर चुकी है। गाँधी प्रतिमाओं और उनकी तस्वीरों को पिछली पुण्यतिथि के बाद धोने-पोंछने का यह पहला अवसर आया है। प्रत्येक वर्ष ऐसा ही होता है, जयंती और पुण्यतिथि के बीच की अवधि में गाँधीजी के
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यदि गाँधीजी राष्ट्रपिता न होते तो शायद इस शताब्दी के महानतम भारतीय संपादक होते। अपने छात्र काल से ही उन्हें लिखने व नाना प्रकार की ऐतिहासिक, साहित्यिक व अन्य विषयों की पुस्तकें पढ़ने का चाव था। उनके स्कूल व कॉलेज के लाइब्रेरियन उनसे खीझ जाते
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