ऑब्जर्वेशन मेडिटेशन कैसे करें, जानिए

अष्टांग का 7वां अंग है ध्यान। दरअसल, 7वीं सीढ़ी है। योग में ध्यान 7वीं स्टेप है। लेकिन वर्तमान में कुछ संस्थान ऐसे हैं, जो व्यक्ति को डायरेक्ट ध्यान लगाने या सिखाने का कार्य करते हैं। उन्होंने अपनी अलग ध्यान विधियां विकसित करके उसकी मार्केटिंग कर रखी है। हालांकि हर तरह के ध्यान का उद्येश्य है आपको यंत्रवत जीवन से बाहर निकालकर पूर्ण जागृत अवस्था में लाना। यह कैसे संभव होगा? यह बहुत ही सरल तरीके से संभव हो सकता है।


दरअसल, हम लगभग 8 घंटे सोते हैं और यही सोने की हमारी आदत दिन में भी जारी रहती है। नींद में ही व्यक्ति जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था को अनुभव करता है। योगी कहते हैं कि विचार, कल्पना और भावनाएं सभी बेहोशी को जन्म देते हैं। यह नींद आपके खयालों, विचारों, कल्पनाओं, भावनाओं, खुशियों और चिंताओं की होती है। जैसे रात में सपने चलते हैं, वैसे ही दिन में खयाल चलते हैं। जागा हुआ आदमी भी नींद में ही रहता है।

आपको यह जानकर आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए कि योगा, प्राणायाम आदि सभी आपके शरीर, मन और बुद्धि की तंद्रा तोड़ने के लिए ही हैं। तंद्रा तो आप समझते ही होंगे। बेहोशी में जिना ही हमने सीखा है जैसे कोई पशु जी रहा है। अब जानिए कि किस तरह से आप ऑब्जर्वेशन अर्थात खुद का और दूसरों का अवलोकन करते हुए आप साक्षी भाव में स्थित हो सकते हैं। यह ऑब्जर्वेशन नए जमाने का नया शब्द है समझने के लिए क्योंकि लोगों को यह समझ में नहीं आता है कि साक्षी भाव क्या होता है। इसीलिए कहने लगे हैं।

तैयारी कैसे करें?
1. पहले आपको यह जानना जरूरी है कि क्या आप ऐसा भोजन करते हैं, जो आपके शरीर में आलस्य भरता है, पेट खराब करता है, मस्तिष्क को भारी करता है या किसी भी प्रकार से अस्वस्थ करता है? यदि ऐसा है तो आपको अपनी डाइट बदलना होगी। नियम से ही भोजन करना होगा, क्योंकि इस ध्यान विधि में शरीर का भारीपन हटाना जरूरी है। भोजन में मात्रा जानना जरूरी है।

2. दूसरा आपको यह जानना चाहिए कि आप कितनी फालतू की बातें करते और कितनी फालतू की बातें सोचते रहते हैं। इस पर ध्यान देना ही इस ध्यान की शुरुआत है। आप यह तय करें कि क्या मैं जो सोच रहा हूं, उससे मेरा कितना नुकसान हो रहा है? और मैं क्यों लगातार एक ही तरह की बातें सोचता या बोलता रहता हूं? कहते हैं कि पागलपन मन में रहता है, तो मौन होने से ही मन की मौत हो जाती है।

मतलब यह कि तन और मन को साधने से ही इस विधि को आप अच्छे से सरलता से या कहें कि आसानी से कर सकते हैं। नहीं साधते हैं तो भी आप कर सकते हैं लेकिन फिर इसके लिए आपको बहुत ही सजग रहना होगा, जो कि किसी जीनियस के बस की ही बात है।


अब जानें ऑब्जर्वेशन ध्यान विधि :
1. दरअसल, यह विधि नहीं है। यह बस खुद और दुनिया को देखने की एक शुद्ध प्रक्रिया है जिसमें किसी भी प्रकार की मिलावट नहीं है, बीच में कोई दीवार नहीं है। जैसे यदि हम किसी व्यक्ति को देख रहे होते हैं, तो हम उस वक्त उसके बारे में सोच भी रहे होते हैं और उसी वक्त हम खयाल भी कर रहे होते हैं।

2. देखने की इस शुद्ध प्रक्रिया या विधि को कहते हैं साक्षी भाव या दृष्टा भाव में रहना अर्थात देखना ही सबकुछ हो। देखने के दौरान सोचना बिलकुल नहीं। यह ध्यान विधि आप कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं। सड़क पर चलते हुए इसका प्रयोग अच्छे से किया जा सकता है।

3. आप इस विधि की शुरुआत में अपनी श्वास को देखना और उसके प्रति सजग रहना प्रारंभ करें। देखने का अर्थ उसके आवागमन को महसूस करना। अपनी आती-जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव। उसके बाद आप धीरे-धीरे भीतर से मौन रहकर देखने और सुनने का अभ्यास करें।

4. देखें और महसूस करें कि आपके मस्तिष्क में 'विचार और भाव' किसी छत्ते पर भिनभिना रही मधुमक्खी की तरह हैं जिन्हें हटाकर 'मधु' का मजा लिया जा सकता है। प्रारंभ में विधि के लिए सुबह और शाम के सुहाने वातावरण का उपयोग करें।

5. जिस दिन आपका देखना और सुना ही रह जाएगा, उस दिन आपके भीतर से सपने भी मिट जाएंगे। सचमुच तब आप नींद को देखेंगे, जहां सभी तरह की सिद्धि और सफलता छिपी हुई है। इससे ही योगनिद्रा कहते हैं। बौद्ध धर्म में असुत्ता मुनि कहते हैं और गीता में स्थितप्रज्ञ।



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