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Written By मनीष शर्मा

बड़बड़ से हड़बड़ से गड़बड़

प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू
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एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू वायुयान से यात्रा कर रहे थे। अचानक वायुयान में कोई खराबी आ गई। बहुत कोशिशों के बाद भी जब पायलट खराबी का कारण नहीं खोज पाया तो उसके माथे पर परेशानी की लकीरें उभर आईं। इस बीच वायुयान अनियंत्रित होकर नीचे की ओर जाने लगा।

इससे पायलट के होश उड़ गए। वह तेजी से नेहरूजी के पास गया और घबराते हुए बोला- सर! वायुयान में खराबी आ गई है। कारण का पता नहीं चल पा रहा है। अब तो यह दुर्घटनाग्रस्त होने वाला है। इस पर पंडित नेहरू ने पसीने से लथपथ पायलट के चेहरे की ओर देखते हुए शांत भाव से कहा- तो मैं क्या करूँ। तुम शांत भाव से सोचकर निर्णय लो।

यह कहकर वे सोफे पर लेटकर ऐसे अखबार पढ़ने लगे जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। उनके इस व्यवहार से पायलट की घबराहट कम हो गई और वह ठंडे दिमाग से खराबी का कारण ढूँढने लगा। जल्द ही उसने कारण जान लिया और खराबी दूर कर दी। वायुयान फिर से सामान्य तरीके से उड़ान भरने लगा।

दोस्तो, कहते हैं धैर्य से किसी भी विपत्ति को वश में किया जा सकता है। जैसे कि नेहरूजी ने धैर्य रखा और एक कुशल लीडर की तरह पायलट को भी शांत रहने की सलाह देकर उसका हौसला बढ़ाया। इससे पायलट की घबराहट के कारण कुंद हुई सोचने-समझने की शक्ति भी वापस आ गई। फिर तो वह अपना काम करना जानता ही था और उसने कर दिखाया।

इसलिए परिस्थिति कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हो, धैर्य या पेशेंस का साथ न छोड़ें, क्योंकि इसके जाते ही सेंस भी चला जाता है और दिमाग काम करना बंद कर देता है। कुछ सूझता ही नहीं कि क्या करें, क्या न करें।

ऐसे में व्यक्ति घबराहट में गलत निर्णय लेकर बेड़ा गर्क कर लेता है। इसीलिए कहते हैं 'एन औंस ऑफ पेशेंस इज़ वर्थ ए पाउंड ऑफ ब्रेन' यानी छटाँकभर धैर्य सेरभर दिमाग या सूझबूझ के बराबर होता है। सूझबूझ के सहारे ही आप कठिनाई पर विजय पा सकते हैं।

कहते भी हैं कि जो बुरे समय का सामना नहीं कर सकता, वह अच्छा समय देखने के लिए जीवित नहीं रहता। इसलिए यदि आप में धैर्य की कमी है तो इसे दूर करें। इसके लिए आपको अपने मन पर काबू रखकर दिमाग को ठंडा रखना होगा। तभी आप ठंडे दिमाग या कूल माइंड से प्रतिकूल वातावरण को अनुकूल बना सकेंगे।

दूसरी ओर, नेपोलियन ने कहा था कि 'ए लीडर इज़ डीलर ऑफ होप' यानी एक नेता उम्मीदों का सौदागर होता है, जो सामने वाले में उम्मीदें पैदा करने के साथ ही उनका पोषण भी करता है। वह निराश व्यक्ति में दोबारा जोश भरकर उसके खोए आत्मविश्वास, खोई आशा को दोबारा जगा देता है, जैसा कि नेहरूजी ने किया। यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि पायलट विमान में खराबी से ज्यादा इस बात को लेकर घबराया हुआ था कि विमान में नेहरूजी जैसा महान नेता बैठा है और संभावित हादसे के परिणाम के बारे में सोचकर ही उसके होश उड़े हुए होंगे।

नेहरूजी ने उसकी मनःस्थिति को समझकर ही उसके साथ वैसा व्यवहार किया। सामान्यतः इस प्रकार की परिस्थितियों में कोई भी बॉस या लीडर अपने कर्मचारी या मातहत की छाती पर खड़ा होकर खराबी न पकड़ पाने पर उसे डाँटने-फटकारने लगता है। ऐसे में पहले से ही घबराया हुआ कर्मचारी रही-सही उम्मीद भी खो देता है और उसे कुछ नहीं सूझता। तब हड़बड़ में और भी गड़बड़ हो जाती है। अतः सूझबूझ यही कहती है कि बड़बड़ करने की बजाय धीरज रखें और सामने वाले को भी दें।

आपके चिल्लाने से समस्या तो हल होगी नहीं। यदि आप घबरा भी रहे हों तो हिम्मत से काम लेकर एक अच्छे लीडर की तरह सामने वाले के मन में बैठे डर को दूर कर उसमें आशा का संचार करें, ताकि वह बिगड़ी को बना सके। वर्ना यदि आप भी घबराकर आपा खो देंगे तो फिर तो बँटाढार होगा ही, होता भी है।

कहते भी हैं अंधे का नेता भी अंधा हो तो दोनों कुएँ में ही गिरेंगे। इसलिए आज नेहरूजी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए हमें उनसे नेतृत्व के गुण सीखना चाहिए। तभी हम अपने दायित्वों को सही तरीके से निभा सकते हैं। अरे भई, अपने काम की गड़बड़ को तो आप ही दूर कर सकते हैं।
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मनीष शर्मा