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Written By मनीष शर्मा

पुरुषों पर भारी पड़ती है नारी

पुरुषों पर भारी पड़ती है नारी
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रानी दुर्गावती द्वारा अपने पति गढ़-मंडला के राजा दलपत शाह की मृत्यु के बाद राज्य का कुशलतापूर्वक संचालन करने के कारण उसकी समृद्धि तेजी से बढ़ने लगी। बादशाह अकबर को यह बात पता लगने पर उन्होंने आसफ खाँ को वहाँ कब्जा करने के लिए भेजा।

रानी दुर्गावती ने उसका मुकाबला करने का फैसला किया। उस समय गढ़ में कुछ सौ सैनिकों की उपलब्धता को देखकर उनके एक सलाहकार ने उन्हें मुगलों से समझौता करने की सलाह दी।

इस पर रानी बोलीं- मैं इन्हीं सैनिकों को साथ लेकर दुश्मन को रोकती हूँ, तब तक तुम सेना जमा करो। रणभूमि में रानी दुर्गावती के युद्धकौशल और जोश को देख दुश्मनों ने दाँतों तले अँगुली दबा ली। मुट्ठीभर सैनिकों के बल पर ही उन्होंने मुगलों को मैदान छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
  रानी दुर्गावती द्वारा अपने पति गढ़-मंडला के राजा दलपत शाह की मृत्यु के बाद राज्य का कुशलतापूर्वक संचालन करने के कारण उसकी समृद्धि तेजी से बढ़ने लगी। बादशाह अकबर को यह बात पता लगने पर उन्होंने आसफ खाँ को वहाँ कब्जा करने के लिए भेजा।      


आसफ खाँ समझ गया कि रानी को एक कमजोर नारी समझकर उसने भारी भूल की है। इसके बावजूद उसने गढ़ पर कई हमले किए और हर बार मुँह की खाई। पहले हमले के बारह वर्ष बाद एक बार फिर गोंडों और मुगलों की सेनाओं का आमना-सामना हुआ। युद्ध आरंभ होते ही राजकुमार बीर नारायण घायल हो गए। रानी ने उन्हें वहाँ से हटवा दिया और अपनी सेना को हिम्मत बँधाते हुए युद्ध करती रहीं। थोड़ी देर में रानी की कनपटी और गले में आकर तीर धँस गए।

रानी के सहयोगियों ने उन्हें समझौता कर लेने की सलाह दी। इस पर रानी बोलीं- यदि एक दिन मरना ही है तो क्यों न रणभूमि में ही अपने प्राण त्यागूँ। कायरों की भाँति अपनी जान बचाने के लिए समझौता क्यों करूँ। ऐसा कहकर तीर लगने से निर्बल हो चुकी रानी ने अपनी छाती में खंजर घोंप लिया।

दोस्तो, रानी दुर्गावती ने यह साबित कर दिया कि राज्य संचालन, रणभूमि आदि क्षेत्र सिर्फ पुरुषों की बपौती नहीं हैं। एक नारी भी इनमें उतनी ही दक्ष हो सकती है, जितने कि पुरुष। उन्होंने बता दिया कि नारी को बेचारी मानना मूर्खता है। यदि वह ठान ले तो पुरुषों पर भी भारी पड़ सकती है।

दरअसल नारी को अबला समझने से बड़ी नासमझी की बात और कुछ हो ही नहीं सकती, क्योंकि समय और मौका मिलने पर अनेक भारतीय नारियों ने इस बात को प्रमाणित किया है कि नारी अबला नहीं, सबला होती है। आज के दौर में तो नारी हर क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़ रही है। इनमें सेना जैसे वे क्षेत्र भी शामिल हैं, जिन पर पुरुष अपना एकाधिकार समझते आए हैं। वहाँ भी रानी दुर्गावती जैसी अनेक महिलाएँ अपने शौर्य की गाथाएँ लिख रही हैं।

दूसरी ओर, यदि आप खुद को अबला समझती हैं, तो यह आपकी गलती है। जो नारी माँ बनकर अपने बच्चों को बल देती हो, जो घर-परिवार का संबल हो, वह सबला ही हो सकती है, अबला नहीं। इसलिए आप अपने मन से इस वहम को निकाल दें और आगे बढ़ें।

आप भी हिमालय की चोटी पर पहुँच सकती हैं, अंतरिक्ष की ऊँचाइयाँ नाप सकती हैं। अतः जरूरी है कि आप अपने अंदर की ताकत को पहचानें और खुद को कमजोर न समझें। कहते हैं कि नारी पुरुषों की तुलना में अधिक भावुक होती है। अधिकतर पुरुष इसी बात का फायदा उठाकर नारी को दबाते चले आए हैं।

अपनी भावनाओं के चलते ही वह उन दबावों का प्रतिकार नहीं करती, जिनका कि आसानी से कर सकती है। यदि आपके साथ भी ऐसा है तो एक सीमा तक तो भावुकता समझ में आती है, लेकिन जब सीमा पार हो जाए, तो सामने वाले को यह अहसास कराना जरूरी हो जाता है कि वह आपको किसी भी तरह से कमजोर या अबला समझने की गलती न करे।

और अंत में, आज रानी दुर्गावती का शहीद दिवस है। यदि आपके परिवार की कोई बालिका कुछ कर दिखाना चाहती है, तो उसे बढ़ावा दें। उसके पैरों में यह कहकर, समझाकर बेड़ियाँ न डालें कि फलाँ काम उसके बूते का नहीं, क्योंकि वह एक नारी है। बल्कि उसे प्रोत्साहित करें ताकि वह अपने सपने को पूरा कर सके।

वैसे यदि आप कुछ कर दिखाने की ठानकर निकल पड़ी हैं, तो ऐसे लोगों की सलाह पर ध्यान न दें जो आपको नारी मानकर आपको हतोत्साहित कर अपने कदम पीछे खींचने के लिए दबाव डालते हैं। अरे भई, अबला और आ बला में मात्र एक मात्रा का अंतर है।
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मनीष शर्मा