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जिसका खाओ, उसी का गाओ

मनीष शर्मा गाओ
जिसका खाओ, उसी का गाओ एक झगड़ालू महिला अपने पति को हमेशा खरी-खोटी सुनाती रहती थी कि जबसे शादी होकर इस घर में आई हूँ, न कहीं घुमाने ले गए और न ही कुछ दिलाया। मायके वालों से मिलने वाले ढेर सारे कपड़ों और गहनों के सहारे ही मैं काम चलाती रहती हूँ।

पति बोला- क्यों, क्या मैं तुम्हें कुछ नहीं दिलवाता? पत्नी- ऐसा क्या दिला दिया, जो इतने गरज रहे हो। वो तो भला हो मेरे भैया का कि वार-त्योहार पर कपड़े-सामान भिजवाते रहते हैं, वरना तुम्हारे भरोसे रहूँ तो छोटी-छोटी चीज के लिए भी तरसती रहूँ।
  दरअसल उसका मायका आर्थिक रूप से कमजोर था और वह गाहे-बगाहे उनकी मदद करती रहती थी। वह मायके जाकर खुद कपड़े-सामान खरीदती और ससुराल में बताती कि यह उसे भाई-भाभी ने दिए हैं। हालाँकि हकीकत सबको पता थी लेकिन कोई उससे कुछ कहकर आफत मोल नहीं लेना चाहता था।      


पति बोला- क्या बकवास करती हो। मैं तो पूरी पगार देकर भी तुमसे हिसाब नहीं लेता। इस पर वह खिसियाकर बोली- सीधे कह दो कि मैं जाकर अपने मायके वालों को दे आती हूँ। अरे, मैं तो उन्हें तुम्हारी पगार तक नहीं बताती, वरना मेरी भाभी कहेगी कि कैसे कँगलों में ब्याह दी। इतना बोलकर वह रोने लगी।

दरअसल उसका मायका आर्थिक रूप से कमजोर था और वह गाहे-बगाहे उनकी मदद करती रहती थी। वह मायके जाकर खुद कपड़े-सामान खरीदती और ससुराल में बताती कि यह उसे भाई-भाभी ने दिए हैं। हालाँकि हकीकत सबको पता थी लेकिन कोई उससे कुछ कहकर आफत मोल नहीं लेना चाहता था।

एक बार जब वह पति से झगड़ रही थी तो उसकी ऊँची आवाज सुनकर अड़ोसी-पड़ोसी भी आ गए और उसे समझाने लगे। जब वह नहीं मानी तो मोहल्ले की एक प्रौढ़ महिला उसके गाल पर एक जोर का तमाचा जड़ते हुए बोली-कुछ तो शर्म कर? पति का खाती है और मायके का गाती है।

दोस्तो, इसी को कहते हैं कि 'खसम का खाए और भाई का गाए।' ऐसी कई महिलाएँ होती हैं जो अपने मायके को बढ़-चढ़कर बताती हैं। वे सोचती हैं कि इससे प्रभावित होकर ससुराल वाले उनके दबाव में रहेंगे, लेकिन होता इसका उल्टा है, क्योंकि किसी भी तरह की तुलना किसी को पसंद नहीं आती। यदि वास्तव में ही ससुराल के मुकाबले आपका मायका अधिक समृद्ध है तो इससे ससुराल वालों के मन में हीन भावना आती है जो आपके लिए ही अहितकर रहती है।

यदि आप मायके की झूठी शान बघारती हैं तो ऐसे में भी मजाक का पात्र आप ही बनती हैं। यानी दोनों ही स्थिति में ससुराल में रहकर मायके का गुणगान किसी भी स्त्री के लिए लाभकारी नहीं हो सकता।

हाँ, गुणगान करना ही है तो दोनों जगहों का करें और वह भी बिना तुलना किए। इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी और दो परिवार एक-दूसरे के और नजदीक आएँगे। तब आपको अपने मायके वालों की सहायता करने या उनसे सहायता लेने में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि दोनों पक्ष ऐसे में एक-दूसरे की मदद करने से पीछे नहीं हटेंगे।

इसके साथ ही भाई का गाने वाली बात और भी कई क्षेत्रों में लागू होती है। जैसे कि कई बार एक कंपनी छोड़कर दूसरी कंपनी में जाने वाले लोग अपने नए साथियों के सामने अपनी पुरानी कंपनी की तारीफों के पुल बाँधते रहते हैं कि वहाँ तो यह आराम था, बहुत सुविधाएँ थीं, माहौल अच्छा था, सहयोगी बहुत अच्छे थे, कर्मचारियों का बहुत ख्याल रखा जाता था। और भी न जाने क्या-क्या। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है।

अब कोई इनसे पूछे कि भैया, जब इतना सब कुछ था तो फिर वह कंपनी छोड़ी ही क्यों? ऐसी बातें करने वाले यह समझ ही नहीं पाते कि इसी आदत के कारण हो सकता है एक दिन उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए, क्योंकि ऐसी बातों से कर्मचारियों पर विपरीत असर होता है। ऐसे में प्रबंधन सोचता है कि ऐसे व्यक्ति से छुटकारा पाना ही श्रेष्ठ है। यदि आप भी इसी प्रवृत्ति के हैं तो जहाँ काम कर रहे हैं, वहाँ मन लगाकर काम करें। भूत को भूलें और वर्तमान की सोचें।

यदि आप अपने भूत से पीछा नहीं छुड़ा पाएँगे तो यह आपके वर्तमान के साथ भविष्य को भी बिगाड़ देगा। इसलिए उचित यही है कि जिसका खाओ, उसी का गाओ। फिर भले ही आप दूसरी जगह से वहाँ आए हों या वहीं के हों। जब रहना वहीं है तो उसके बारे में उल्टा-सीधा बोलकर आप अपनी ही इज्जत कम करते हैं। एक बात पूछूँ, कोई घर-जँवाई अपनी पत्नी से झगड़ा करते समय क्या कहता होगा?
लेखक के बारे में
मनीष शर्मा