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Amarnath Yatra 2026 : 5 दिन में बाबा बर्फानी 'अंतर्ध्यान', बड़ी चेतावनी तो नहीं, अमरनाथ गुफा में कैसे बनता है बर्फ का शिवलिंग? क्या है विज्ञान और आस्था का सबसे बड़ा रहस्य

amarnath yatra 2026
समुद्र तल से करीब 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि प्रकृति का अद्भुत चमत्कार भी है। यहां हर वर्ष प्राकृतिक रूप से बनने वाला हिम शिवलिंग (बाबा बर्फानी) श्रद्धालुओं के लिए भगवान शिव का साक्षात स्वरूप माना जाता है, लेकिन इस साल प्राकृतिक बर्फ का शिवलिंग लगभग पूरी तरह पिघल गया है। 57 दिन चलने वाली यात्रा 5वें दिन ही शिवलिंग पूरी तरह से पिघल गया। इस साल यात्रा के लिए करीब 4 लाख श्रद्धालुओं ने रजिस्ट्रेशन कराया है। कठिनाई भरे रास्तों से बाबा एक झलक पाने के लिए कठिन रास्तों से पहुंचे भक्तों को निराशा हाथ लगी। शिवलिंग का इतनी जल्दी पिघलना कहीं प्रकृति का मानवों को एक बड़ी चेतावनी तो नहीं। 

आखिर क्यों उठा सवाल, पहले भी तो पिघले 

आखिर यह हिमलिंग बनता कैसे है? क्या यह केवल चमत्कार है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया भी काम करती है? इस बार यह सवाल इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों में हिमलिंग का आकार तेजी से छोटा हो गया है। बीएसएफ द्वारा 23 मई को जारी तस्वीरों में हिमलिंग की ऊंचाई लगभग 7 फुट दिखाई गई थी। 29 जून को पहली पूजा के समय भी इसकी ऊंचाई 5 फुट से अधिक थी, लेकिन 3 जुलाई तक इसका आकार घटकर करीब 4 फुट रह गया।

जब यात्रा से पहले ही पिघले 

2006 में शिवलिंग तीर्थ यात्रा शुरू होने से पहले ही पवित्र गुफा से विलुप्त हो गया था। 2004 में तीर्थ यात्रा लगभग एक महीने तक चली और भगवान 15 दिनों के के अंदर बाबा बर्फानी पिघल गए थे। 2013 में 22 दिनों और 2016 में 13 दिनों में अंदर शिवलिंग पिघल गया था। 
 

कैसे बनता है अमरनाथ का प्राकृतिक हिमलिंग?

अमरनाथ गुफा के भीतर मौजूद शिवलिंग किसी कलाकार द्वारा बनाई गई बर्फ की कलकृति नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम है। अमरनाथ का हिमलिंग पूरी तरह प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक प्रक्रिया से बनता है।गुफा की छत के ऊपर मौजूद चूना पत्थर और जिप्सम की चट्टानों के बीच से ग्लेशियरों का पिघला पानी धीरे-धीरे रिसता है। जब यह पानी बूंद-बूंद करके गुफा के फर्श पर गिरता है तो गुफा के भीतर मौजूद शून्य से नीचे तापमान में जमने लगता है।  समय के साथ ये जमी हुई परतें ऊपर की ओर बढ़ती जाती हैं और एक बर्फ का स्तंभ तैयार हो जाता है। यही प्राकृतिक बर्फ का स्तंभ श्रद्धालुओं के लिए बाबा बर्फानी या हिम शिवलिंग है।

प्रकृति ने बनाई है रहस्यमयी गुफा

अमरनाथ मंदिर किसी इंसान द्वारा निर्मित मंदिर नहीं है।  प्राकृतिक चूना पत्थर और जिप्सम की गुफा वर्ष के अधिकांश समय बर्फ से ढंकी रहती है। गुफा के भीतर मुख्य हिमलिंग के अलावा दो छोटे हिम स्तंभ भी बनते हैं जिन्हें श्रद्धालु माता पार्वती और भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है। अमरनाथ गुफा दुनिया के रहस्यमयी स्थानों में शामिल है, जहां प्रकृति, विज्ञान और आध्यात्मिक आस्था एक साथ दिखाई देते हैं। विज्ञान हिमलिंग बनने की प्रक्रिया को समझाता है, जबकि श्रद्धालुओं के लिए यह भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है। यही कारण है कि अमरनाथ केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि विश्वास, प्रकृति और रहस्य का अद्भुत संगम बन चुका है।

भगवान शंकर ने पार्वती को यहीं सुनाई थी अमर कथा

हिन्दू पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक माता पार्वती ने भगवान शिव से उनकी अमरता का रहस्य पूछा था।  भगवान शिव उन्हें यह रहस्य बताने के लिए ऐसी जगह की तलाश में निकले जहां कोई जीवित प्राणी मौजूद न हो। इसी कारण उन्होंने अमरनाथ गुफा को चुना।

रास्ते में उन्होंने  पहलगाम में नंदी को छोड़ा। चंदनवाड़ी में अपने मस्तक से चंद्रमा को अलग किया। शेषनाग झील के पास सर्पों को त्याग दिया। महागुणस पर्वत पर भगवान गणेश को छोड़ा। पंचतरणी में पंचमहाभूतों का त्याग किया। इसके बाद अमरनाथ गुफा में समाधि लगाकर उन्होंने माता पार्वती को अमर कथा सुनाई।  कथा सुनते समय माता पार्वती कुछ देर के लिए सो गईं, लेकिन गुफा में मौजूद कबूतरों के एक जोड़े ने पूरी कथा सुन ली और अमर हो गए। आज भी कई श्रद्धालु गुफा में कबूतरों का जोड़ा दिखाई देने का दावा करते हैं।

श्रद्धालुओं की भीड़ है शिवलिंग के पिघलने की जिम्मेदार 

क्या बाबा के 'अदृश्य' होने के पीछे केवल मौसम जिम्मेदार है या फिर हिमालय का बदलता पर्यावरण, बढ़ती गर्मी और इंसानी गतिविधियां भी इस पवित्र स्थल के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर रही हैं? वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की ओर इशारा है। इसके लिए केवल भीड़ को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग और बदलते मौसम की भूमिका इससे कहीं अधिक बड़ी मानी जा रही है। शिवलिंग  काआकार हर साल मौसम, बर्फबारी, तापमान और गुफा के भीतर मौजूद प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
यदि तापमान सामान्य से अधिक रहता है या बर्फबारी कम होती है तो हिमलिंग जल्दी पिघलने लगता है। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर और पूरे हिमालयी क्षेत्र में मौसम का पैटर्न तेजी से बदला है। सर्दियों में अपेक्षाकृत कम बर्फबारी और गर्मियों में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया जा रहा है। गुफा के भीतर बर्फ लंबे समय तक टिक नहीं पा रही है। पहले जहां हिमलिंग अगस्त तक सुरक्षित रहता था, लेकिन अब यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद बर्फ पिघलने से आकार तेजी से घटता है।
लेखक के बारे में
सुधीर शर्मा
सुधीर शर्मा विश्व के प्रथम हिन्दी न्यूज पोर्टल वेबदुनिया में सीनियर सब एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। इनके पास मीडिया और डिजिटल कंटेंट के क्षेत्र में 20 से अधिक वर्षों का व्यापक अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नईदुनिया से प्रूफ रीडर के रूप में की। 2012 से.... और पढ़ें