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जब तक है साँस तब तक है आस

सरस्वती जयंती वसंत पंचमी
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हमेशा अपनी कक्षा में अव्वल रहने वाले बसंत ने अतिआत्मविश्वास के चलते पूरे साल पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया। नतीजतन इस बार वह फेल हो गया। अब उसकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी अपने परिजनों का सामना करने की। वह सोच रहा था कि माँ दुःखी होगी। पिताजी नाराज होंगे। साथी ताना मारेंगे। दादाजी का दिल टूट जाएगा।

यह सब सोचकर वह अवसाद से घिर गया। अचानक वह चल दिया शहर के बाहर बने ब़ड़े तालाब की ओर। वहाँ पहुँचकर उसने जैसे ही तालाब में छलाँग लगाना चाही कि उसे एक अपाहिज भिखारी बाबा ने पकड़कर अपनी ओर खींच लिया। वह चिल्लाया- मुझे मर जाने दो। मैं जीना नहीं चाहता। मैं अपने घर वालों को दुःखी नहीं देख सकता।

बाबा उससे बोले- ऐसा क्या हो गया जो मरना चाहते हो। रोते-रोते उसने सारी बात उन्हें बताईं। तब वे बोले- बड़े मूर्ख हो तुम। कहते हो घर वालों को दुःखी नहीं देख सकते। तुम्हारे मरने पर क्या उन्हें खुशी होगी? कितने अरमानों से पाल-पोसकर बड़ा कर रहे हैं वे तुम्हें। कभी सोचा है तुम्हारे पीछे उनका क्या होगा?
  हमेशा अपनी कक्षा में अव्वल रहने वाले बसंत ने अतिआत्मविश्वास के चलते पूरे साल पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया। नतीजतन इस बार वह फेल हो गया। अब उसकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी अपने परिजनों का सामना करने की। वह सोच रहा था कि माँ दुःखी होगी।      


जीवन के उतार-चढ़ावों से घबराकर आत्महत्या करना तो कायरों का काम है। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। हिम्मत से काम लो। यदि तुम वास्तव में अपनी गलती पर शर्मिंदा हो, तो एक बार फिर अव्वल आकर दिखाओ। जब तक साँस है, तब तक आस है। मुझे देखो। मैं अपाहिज बूढ़ा होकर भी मरने की नहीं सोचता। लोग जीवन में न जाने कैसे-कैसे दुःख झेल जाते हैं और तुम हो कि केवल एक असफलता से घबरा गए। कुछ नहीं तो अपने नाम की तो लाज रखो।

बसंत ऋतुओं का राजा है जो पतझड़ के बाद आता है। बसंत के माध्यम से प्रकृति हमें संदेश देती है कि जिस तरह पतझड़ के बाद बिना वर्षा के भी पेड़ों पर नई कोंपलें खिल सकती हैं, नई पत्तियाँ आ सकती हैं, उसी प्रकार हमारे जीवन में भी कठिनाइयों के पतझड़ के बाद खुशियों का बसंत आता ही है। फिर तुम तो खुद ही बसंत हो। जाओ, मन लगाकर पढ़ो और अपने परिवार का नाम रोशन करो। उनकी बातों से भावुक हुआ बसंत उनके पैर छूकर घर को चल दिया।

दोस्तो, वह बसंत तो बच गया। लेकिन कोई दूसरा बालक बसंत की तरह परिस्थितियों से घबराकर, उदास होकर, हताश होकर उसकी तरह आत्महत्या करने की न सोचे, हम सभी का दायित्व है। क्योंकि इसके लिए दोषी पालक भी होते हैं। वे अपने बच्चों से इतनी अपेक्षा कर लेते हैं, इतने अरमान पाल लेते हैं कि उनका बाल या किशोर मन अपने माँ-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए जुट जाता है।
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एकाध असफलता के बाद ही उन्हें लगने लगता है कि वे उन सपनों को पूरा करने के काबिल ही नहीं हैं, तो वे तनावों से घिर जाते हैं। और जब तनाव असहनीय हो जाता है तो वे खुद को खत्म करने की सोचने लगते हैं। कई बार कर भी लेते हैं।

इसलिए बच्चों के मन में असफलता का इतना डर पैदा न करें कि वह उनके दिलो-दिमाग में घर कर जाए और आप अपने ही हाथों अपने नौनिहाल का हाल-बेहाल कर दें और बाद में पछताते रह जाएँ। इसके उलट, एक अच्छे पालक की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने बच्चों को इतना साहसी बनाए कि वे नाकामियों का सामना करना सीखें। तभी तो वे उन्हें कामयाबियों में बदलेंगे।

दूसरी ओर, कायर व्यक्ति ही आत्महत्या जैसे कदम उठाने की सोचता है, उठाता है। वैसे भी यह किसी समस्या का हल नहीं है। क्योंकि इससे समस्या वहीं रहती है और आत्महत्या करने वाला मैदान छोड़ जाता है। यदि आपके मन में भी ऐसे विचार उठते रहते हैं तो इसका मतलब है कि आप भी कायर हैं। इसलिए आज बसंत पंचमी पर फैसला करें कि आगे से जब भी ऐसे विचार मन में आते ही उन पर तुरंत फायर कर देंगे।

यानी अपने आपको ही कोसेंगे कि मैं भी कितना कायर हूँ जो ऐसी बातें सोच रहा हूँ। इस तरह अपने आपको कोसने से ऐसे विचार आपसे कोसों दूर चले जाएँगे और आपके अंदर प्रतिकूल स्थितियों का सामना करने की ताकत भी आ जाएगी।

और अंत में, आज सरस्वती जयंती भी है। इसलिए ज्ञान की देवी से प्रार्थना करें कि हमें इतना ज्ञान दें कि हमारे मन में कभी अज्ञानियों जैसे विचार न आएँ। 'वर दे....वर दे....वीणावादिनी वर दे...।'
लेखक के बारे में
मनीष शर्मा