चार्टर्ड अकाउंटेंसी छोड़ कैसे बने संजय लीला भंसाली की पहली पसंद, सिद्धांत चतुर्वेदी की महत्वाकांक्षा की कहानी
संजय लीला भंसाली के बैनर तले आने वाली फ़िल्म 'दो दीवाने सेहर में' को लेकर सिद्धांत चतुर्वेदी इन दिनों ख़ास चर्चा में हैं। इसी बीच उन्होंने अपने अब तक के सफ़र को याद करते हुए 2008 के स्कूल फेयरवेल की एक पुरानी तस्वीर शेयर की है और अपनी ज़िंदगी के शुरुआती दौर के बारे में खुलकर बात भी की है।
सिद्धांत ने लिखा है कि वर्ष 2008 में उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि 18 साल बाद ज़िंदगी उन्हें यहाँ तक ले आएगी। उस समय वे भीड़ में चुपचाप अपने सपनों को छुपाए हुए थे। क्लास में जहाँ ज़्यादातर बच्चे इंजीनियर, डॉक्टर या एस्ट्रोनॉट बनने की बात करते थे, वहीं हिम्मत के अभाव में अभिनेता बनने का सपना उन्होंने भीतर ही भीतर सँजोया हुआ था।
उन्होंने बताया कि इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने चार्टर्ड अकाउंटेंसी छोड़ने जैसा बड़ा फ़ैसला लिया। इसके बाद ऑडिशन की लंबी कतारें, इंतज़ार और कई रिजेक्शन उनके सफर का हिस्सा रहीं। सिद्धांत आगे लिखते हैं कि आज उन्हें जब भंसाली सर के बैनर तले काम करने का मौका मिला है, तो यह उनके लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है। अपने इस पूरे सफ़र के लिए वे भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं।
अपने अनुभव साझा करते हुए सिद्धांत ने यह भी कहा कि इस रास्ते में कई लोग उनके साथ जुड़े। कई बीच रास्ते ही उनका भरोसा तोड़कर चले गए, लेकिन उनका मानना है कि सपने उनके हैं, तो सपनों का बोझ उठाना भी उनकी अपनी ज़िम्मेदारी है। हालांकि अपने फ़ैसलों को लेकर लोगों ने उन्हें कभी घमंडी तो कभी ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वासी कहा, लेकिन सिद्धांत इसे अपनी महत्वाकांक्षा की रक्षा मानते हैं।
'गली बॉय' से पहचान बनाने वाले सिद्धांत चतुर्वेदी ने 'गहराइयाँ' और 'खो गए हम कहां' जैसी फ़िल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए हैं। अब 'धड़क 2' और 'दो दीवाने सेहर में' के साथ वे अपने करियर के एक नए दौर में कदम रखने जा रहे हैं। फिलहाल उनका यह सफ़र यही बताता है कि सपनों तक पहुँचने के लिए हिम्मत, धैर्य और लगातार मेहनत सबसे ज़रूरी होती है।