मजरूह सुलतानपुरी : हम अकेले ही चले थे...
‘हम अकेले ही चले थे जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।’ जिंदगी के फलसफे को इतने आसान शब्दों में बयान करने की अद्भुत क्षमता के धनी और दादा साहब फाल्के अवॉर्ड हासिल करने वाले पहले गीतकार मजरूह सुलतानपुरी सही मायनों में उर्दू शायरी की एक नई तबीयत को पोसती परम्परा के अगुवा थे।‘दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें...’ जैसे गीतों के जरिये जिंदगी से जुड़े दुनिया के सवालों के जवाब ढूँढते शायर और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी के कलाम में जिंदगी के अनछुए पहलुओं से रूबरू कराने की जबर्दस्त कूवत थी।आला दर्जे के उर्दू शायर और हिन्दी फिल्मों के गीतकार के रूप में अपने नाम का परचम फहराने वाले मजरूह के कलम की स्याही नज्मों की शक्ल में ऐसी गाथा के रूप में फैली, जिसने उर्दू शायरी को महज मोहब्बत के सब्जबागों से निकालकर दुनिया के दीगर स्याह सफेद पहलुओं से भी जोड़ा। साथ ही उन्होंने रूमानियत को भी नया रंग और ताजगी दी।मजरूह के प्रेरणास्रोत कहे जाने वाले जिगर मुरादाबादी के शागिर्द शायर बेकल उत्साही ने कहा कि मजरूह एक ऐसे शायर थे जिनके कलाम में समाज का दर्द झलकता था। उन्होंने जिंदगी को एक दार्शनिक के नजरिये से देखा और उर्दू शायरी को नए आयाम दिए। उनके लिखे फिल्मी गीतों में एक नयापन और अपनापन महसूस किया जा सकता है।मजरूह को एक हद तक प्रयोगवादी शायर और गीतकार भी कहा जा सकता है। उन्होंने अवध के लोकगीतों का रस भी अपनी रचनाओं में घोला था। उससे पहले शायरी की किसी और रचना में ऐसा नहीं देखा गया था। उनका लिखा गीत ‘दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें’ खासकर बेहद पसंद किया गया।मजरूह को खासकर फिल्मी गीत लिखने के लिये ज्यादा लोकप्रियता मिली लेकिन कई लोग मानते हैं कि मजरूह मुख्य रूप से शायर ही थे। कहा जाता है कि मजरूह ने फिल्मों में सिर्फ शौक के लिए लिखा, लेकिन गजल उनका पहला प्यार थी। उन्होंने फिल्मी गानों में भी उर्दू अदब की तासीर को बरकरार रखने पर पूरा ध्यान दिया था।समाज और आम जिंदगी की फिक्र बयां करते मजरूह का शुमार कलम के जरिये समाजवाद का झंडा बुलंद करने वाले शायरों में किया जाता है। तरक्कीपसंद मुसन्निफीन मूवमेंट (प्रगतिशील लेखक आंदोलन) से जुड़ने के बाद कथित सरकार विरोधी लेखन की वजह से उन्हें कुछ दिन कालकोठरी में भी गुजारने पड़े थे।हकीम का पेशा छोड़कर कलम से दुनियावी परेशानियों का इलाज ढूँढने निकले मजरूह ने 1940 के दशक में मुम्बई में नज्म ‘‘माज ए साथी जाने न पाए’’ पढ़ी थी। तत्कालीन सरकार ने इसे सत्ताविरोधी करार दिया था जिसकी वजह से मजरूह को तकरीबन दो साल तक जेल में रहना पड़ा था।असरार उल हसन खान उर्फ मजरूह सुलतानपुरी का जन्म दो अक्टूबर वर्ष 1919 को उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में हुआ था। उनकी जन्मतिथि को लेकर हालाँकि विवाद है। प्रारम्भिक और माध्यमिक शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने लखनउ के तकमील उत तिब कालेज से यूनानी चिकित्सा की डिग्री प्राप्त की थी।मजरूह एक हकीम के रूप में स्थापित हो चुके थे, लेकिन उनकी किस्मत में कुछ और ही लिखा था। उनका रुझान शायरी की तरफ बढ़ा और सुलतानपुर में एक मुशायरे में गजल सुनाने के बाद उनकी जिंदगी ने नया मोड़ ले लिया। मुशायरे में अपनी गजल को मिली तारीफ से उत्साहित मजरूह ने शायरी को गम्भीरता से लिया। इसी दौरान वे प्रख्यात शायर जिगर मुरादाबादी के सम्पर्क में आए। मजरूह ने वर्ष 1945 में मुम्बई में एक मुशायरे में अपना कलाम पेश किया और लोगों ने उनकी खुले दिल से तारीफ की। फिल्म निर्माता ए. आर. कारदार भी मजरूह की नज्मों के मोहपाश में जल्द ही बँध जाने वालों में थे। उन्होंने मजरूह से फिल्मों में लिखने की पेशकश की जिसे इस शायर ने ठुकरा दिया। बाद में जिगर मुरादाबादी के समझाने पर वे राजी हुए।मजरूह ने वर्ष 1946 में आई फिल्म शाहजहाँ के लिए गीत ‘जब दिल ही टूट गया’ लिखा जो बेहद लोकप्रिय हुआ। उसके बाद उन्होंने ‘अंदाज’ और ‘आरजू’ फिल्म के गीत लिखे जिससे वे एक गीतकार के रूप में स्थापित हो गए।फिल्म ‘दोस्ती’ का गीत ‘चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे’ लिखने के लिए मजरूह को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया था। बाद में वे प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के अवॉर्ड हासिल करने वाले पहले गीतकार भी बने।अपने गीतों के जरिये लोगों को जिंदगी के अहम पहलुओं पर सोचने को मजबूर करने, मोहब्बत की ताजगी भरी छुअन का एहसास कराने और जीवन के अनछुए पहलुओं को गीतों और गजलों में पिरोने वाले मजरूह का 24 मई 2000 को मुम्बई में निधन हो गया।
(भाषा)
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