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बाहुबली की सफलता के पांच कारण

बाहुबली ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा दिया है। दक्षिण भारत में सलमान की रिलीज होने वाली फिल्म 'बजरंगी भाईजान' को सिनेमाघर मिलने में परेशानी हो रही है क्योंकि सिनेमाघर मालिकों को लगता है कि दूसरे सप्ताह में भी बाहुबली, बजरंगी पर भारी पड़ेगी। डब कर हिंदी में रिलीज की गई बाहुबली को भी अच्छी सफलता मिल रही है। पेश है फिल्म की सफलता के पांच कारण। 
 
अद्‍भुत वीएफएक्स
 
भारतीय सिनेमा अक्सर तकनीकी के स्तर पर हॉलीवुड सिनेमा से मार खाता है। हॉलीवुड फिल्मों के वीएफएक्स देख दर्शक चकित रह जाते हैं। कुछ ऐसा ही कमाल बाहुबली में भी देखने को मिला। फिल्म का वीएफएक्स ऊंचे स्तर का है। यह काम इतनी सफाई से किया गया है कि कही नकली या बनावटीपन नजर नहीं आता। दर्शक ये कमाल देख चमत्कृत रह गए। पूरी फिल्म लाजवाब लगती है और मुंह फाड़े दर्शक बस फिल्म में डूब जाता है। 

रामायण-महाभारत से प्रेरणा
बाहुब‍ली नामक नया किरदार गढ़ा गया है, लेकिन कहानी रामायण-महाभारत से प्रेरित है, इससे दर्शकों का जुड़ाव फिल्म की ओर होता है। प्राचीन कहानी है इसलिए भव्यता दिखाने का भरपूर मौका निर्देशक को मिला है। राजा-महाराजाओं की कहानी को कुछ इस अंदाज में पेश किया है कि आज के दर्शक भी फिल्म से जुड़ जाते हैं। 

लार्जर देन लाइफ का मजा
लार्जर देन लाइफ सिनेमा देखने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है और इन दर्शकों की अपेक्षा का स्तर बहुत ऊंचा रहता है। लार्जर देन लाइफ सिनेमा बनाना आसान बात नहीं है क्योंकि इसमें बहुत मेहनत लगती है। परदे के पीछे की गई मेहनत साफ दिखाई देती है। एक-एक दृश्य को पूरी मेहनत के साथ गढ़ा है। फिल्म का दूसरे हिस्से में लंबा युद्ध दिखाया गया है। इसके बावजूद दर्शक बोर नहीं होते क्योंकि इन दृश्यों में फिल्म के हीरो के जबरदस्त कारनामे देखने को मिलते हैं। 

सही कलाकारों का चुनाव 
फिल्म के लिए चुने गए कलाकार किरदार की डिमांड पर खरे उतरते हैं। प्रभाष ऐसे लगते हैं जिनकी भुजाओं में सैकड़ों हाथी का बल हो। उनका स्क्रीन प्रजेन्स जोरदार है और वे उस हीरो जैसे नजर आते हैं जो हर मुसीबत से लड़ने का माद्दा रखता हो। राणा दग्गुबाती भी जबरदस्त रहे हैं और प्रभाष को कड़ी टक्कर देते हैं। तमन्ना बेहद खूबसूरत लगी हैं और अनुष्का ने अपने किरदार में जान फूंक दी है। 

एसएस राजामौली
निर्देशक एसएस राजामौली फिल्म की सफलता के पीछे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। इतनी बड़ी फिल्म को संभालना अत्यंत ही कठिन काम है, लेकिन राजामौली की पकड़ फिल्म के हर डिपार्टमेंट पर नजर आती है। कहानी और तकनीक का संतुलन उन्होंने बखूबी बनाए रखा और किसी भी विधा को हावी नहीं होने दिया। फिल्म देखने के बाद दर्शक इस अनुभूति के साथ बाहर निकलता है कि उसके ढाई घंटे बहुत ही अच्छे गुजरे हैं।