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बकरी को बचाने के लिए बाघ से भिड़ी लड़की, फिर ली सेल्फ़ी

Updated: गुरुवार, 5 अप्रैल 2018 (11:38 IST)
- संजय रमाकांत तिवारी (महाराष्ट्र से)
 
बाघ के पंजों से बुरी तरह घायल और खून से लथपथ इस बहादुर लड़की ने घर के भीतर आने के बाद क्या किया? अपना मोबाइल फ़ोन निकालकर अपनी और घायल माँ की सेल्फ़ियां लीं।
 
क्योंकि बाघ अब भी बाहर था, सुरक्षा की गारंटी नहीं थी, लिहाज़ा वो अपनी हालत को कैमरे में सुरक्षित कर लेना चाहती थी।
 
21 साल की कॉमर्स ग्रैजुएट रुपाली मेश्राम एक दुबली-पतली सी ग्रामीण लड़की हैं। साधारण परिवार की इस लड़की के सिर पर, दोनों हाथ-पाँव और कमर पर घाव के निशान दिखते हैं। सिर और कमर के घाव गहरे थे लिहाज़ा वहां टांके आए हैं।
 
नागपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के अहाते में वह अपना डिस्चार्ज कार्ड दिखाती हैं जिस पर घावों की वजह साफ़ लिखी है- जंगली पशु बाघ का हमला। हालांकि असली कहानी यह है कि किस तरह से उसने और उसकी माँ ने बाघ से भिड़कर ख़ुद की जान बचाई, लेकिन फिर भी गाँव लौटने का हौसला बाकी है।
 
लकड़ी से लड़की ने किया बाघ का सामना
पूर्वी विदर्भ में भंडारा ज़िले के नागझिरा इलाक़े में वाइल्ड लाइफ़ सैंक्चुरी (वन्य जीव अभयारण्य) से सटे गाँव में रुपाली का छोटा-सा घर है। उसकी माँ जीजाबाई और बड़ा भाई वन विभाग के लिए दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं।
 
उसके अलावा परिवार ने बकरियाँ पाल रखी हैं ताकि कुछ और रुपए बच पाएं। इसीलिए 24 मार्च की रात जब बकरियों के चिल्लाने की आवाज़ें आईं तो नींद से उठकर रुपाली ने घर का दरवाज़ा खोल दिया।
 
आंगन में बंधी बकरी ख़ून से लथपथ थी और उसके क़रीब हल्की रोशनी में दिखती बाघ की छाया। उसे बकरी से दूर करने के इरादे से रुपाली ने एक लकड़ी उठाकर बाघ पर वार किया। वो बताती हैं कि लकड़ी की मार पड़ते ही बाघ ने उन पर धावा बोला।
 
"उस के पंजे की मार से मेरे सिर से ख़ून बहने लगा, लेकिन मैं फिर भी उस पर लकड़ी चलाती रही। मैंने चीख़ कर मां को बाघ के बारे में बताया।"
रुपाली की माँ जीजाबाई कहती हैं, "जब मैं रुपाली की चीख सुनकर बाहर आई तो उसके कपड़े खून से लथपथ थे। मुझे लगा कि अब वो मर जाएगी। उसके सामने बाघ था। मैंने भी लकड़ी उठाकर उस पर दो बार वार किए। उसने मेरे दाहिनी आंख के पास पंजे से वार किया। लेकिन, मैं जैसे-तैसे रुपाली को घर के भीतर लाने में सफ़ल रही। हमने दरवाज़ा भी बंद कर दिया। छोटी-सी बस्ती होने के चलते घर दूर-दूर बने हैं। शायद इसलिए हमारी चीखें किसी को सुनाई ना दी हो।"
 
ठीक तभी रुपाली ने कुछ ऐसा किया जिसकी ऐसे समय कल्पना भी नहीं की जा सकती। उसने मोबाइल फ़ोन निकालकर अपनी और मां की कुछ सेल्फ़ियां ले लीं।
 
'लगा था कि ढेर हो जाऊंगी'
वो इसकी वजह बताती हैं कि ''बाघ उस वक्त भी बाहर था। हमारे बचने की कोई गारंटी नहीं थी। मेरे सिर से और कमर से ख़ून बहता जा रहा था। कपड़े ख़ून से सन गए थे। ऐसे में हमारे साथ जो कुछ हुआ था उस हादसे का मैं एक रिकॉर्ड रखना चाहती थी। माँ ने लोगों को फ़ोन करने का सुझाव दिया। मैंने कुछ लोगों को फ़ोन करके बताया भी। इनमें एक वनकर्मी भी था जो आधे घंटे बाद पहुँचा। हम भी बाहर आए, लेकिन तब तक बाघ जा चुका था।''
 
रुपाली ने बताया, "मेरी साँसें असामान्य गति से चल रही थीं। लग रहा था कि मैं ढेर हो जाऊंगी। गाँव के डॉक्टर की सलाह पर एम्बुलेंस बुलाकर हमें तहसील के अस्पताल ले जाया गया जहाँ मेरे घांवों पर टांके लगे। फिर हमें ज़िला अस्पताल भेजा गया। दो दिन बाद हमें नागपुर के सरकारी अस्पताल रेफ़र किया गया। यहां एक्स-रे और सोनोग्राफी तमाम टेस्ट हुए।"
 
मंगलवार को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया हालांकि इसी महीने दो बार और आने को कहा गया है। अस्पताल के सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. राज गजभिये ने बताया कि अब दोनों के घाव भर रहे हैं, लेकिन उन के घावों से पता चल रहा था कि बाघ से भिड़ंत के दौरान उन्होंने बहादुरी का परिचय दिया। हालांकि, सौभाग्य से बाघ के जबड़े से ख़ुद को बचाने में वे कामयाब रहीं।
हमने उन्हें रेबीज और उस तरह की बीमारियों की आशंका से सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त दवाइयां दी हैं। लेकिन समस्याओं की फ़ेरहिस्त यहीं ख़त्म नहीं हो जाती। पिछले दस दिनों से माँ और भाई दोनों काम पर नहीं जा सके हैं। ज़ाहिर है कि आर्थिक समस्या काफ़ी है।
 
रुपाली बताती है कि इलाके के पूर्व सांसद शिशुपाल पटले ने उन्हें फ़ोन कर मदद की बात कही है। हमने श्री पटले से फ़ोन पर पूछा तो उन्होंने मेश्राम परिवार को वन विभाग से सहायता दिलाने के लिए राज्य के वन मंत्री से सम्पर्क में होने की बात कही। उन्होंने कहा कि इस बहादुर लड़की को वन विभाग में ही स्थायी नौकरी मिल जाए तो उन्हें ख़ुशी होगी।
 
घर लौटने पर डर लगता है?
लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी बाकी है। सिर्फ़ एक लकड़ी हाथ में लिए जब वह बाघ के सामने डटी थी, तब रुपाली के दिमाग़ में क्या चल रहा था?
 
रुपाली की आँखों में फिर कठोर भाव जाग जाते हैं। वह बताने लगती हैं,"कुछ देर तक ख़्याल आया कि शायद मैं नहीं बचूँगी। लेकिन मैंने खुद को चेतावनी दी कि मुझे हारना नहीं है।"
 
क्या लौटने पर डर या आशंका की भावना आती है?
 
उसका जवाब है कि ''चिंता हो सकती है, लेकिन डर बिल्कुल नहीं। मैं ज़िन्दगी में कभी किसी बाघ से नहीं डरूंगी।''
 
अब वो कॉमर्स ग्रैजुएट क्या बनना चाहती हैं?
 
उसका कहना है,"किसी बैंक में नौकरी का सपना देखती हूं। लेकिन उसके लिए कोचिंग ज़रूरी है और मेरे पास रुपए नहीं हैं...तो जो ठीक-ठाक काम मिल जाए, वही ढूंढना होगा।"... फिर वो दुबली-पतली, लेकिन धुन की पक्की लड़की ख़ुद ही बुदबुदाती है, "लेकिन किसी जंगली बाघ से डरने का सवाल ही नहीं है।"

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