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वो मुल्क जहां लड़के, लड़कियां और लड़कियां, लड़के बनकर रह सकते हैं

Updated: शुक्रवार, 31 अगस्त 2018 (17:05 IST)
- इगल गेरूलेताइत (बीबीसी ट्रैवल)
 
दुनिया के तमाम विकसित देशों में इस वक़्त LGBT लोगों को समाज में बराबरी का हक़ और उन्हें थर्ड जेंडर के रूप में स्वीकार करने को लेकर बहस छिड़ी है। इन्हें क़ानूनी अधिकार देने की मांग ज़ोर पकड़ रही है। लेकिन तरक़्क़ी की रफ़्तार से कोसों दूर लैटिन अमेरिकी देश पनामा के कुछ द्वीप LGBT लोगों का तहे-दिल से स्वागत करते हैं।
 
 
गुना याला, जिसे सेन ब्लास के नाम से भी जाना जाता है। यह पनामा के पश्चिमी किनारे पर एक द्वीपसमूह है। यहां पर क़रीब 300 छोटे-छोटे द्वीप हैं। इनमें से 49 ऐसे द्वीप हैं, जिन पर गुना याला के आदिवासी रहते हैं। ये आज भी अपने पूर्वजों की तरह जीते हैं। खजूर के पेड़ की छाल से बनी छतों वाले छोटे-छेटे लकड़ी के घरों में रहते हैं।
 
 
गुना याला कई मायनों में पनामा और आस-पास के देशों से अलग है। ये एक स्वायत्त स्वदेशी इलाक़ा है। इनका अपना झंडा है, जिस पर काला स्वास्तिक का निशान है। मान्यता है कि ये निशान चारों दिशाओं को दर्शाता है। यानी ये अपने आप में सारी दुनिया को समेटे है। लेकिन गुना याला को जो चीज़ ख़ास पहचान देती है वो है सहिष्णुता और लिंग समानता। यानि यहां मर्द, औरत या थर्ड जेंडर के साथ भेदभाव नहीं होता।
 
 
यहां लगभग पूरी आबादी महिलाओं की है। ये हैरान करने वाली बात है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यहां सिर्फ़ लड़कियों का ही जन्म होता है। यहां लड़के भी पैदा होते हैं। लेकिन, अगर वो बड़े होकर ओमेगिद बनना चाहते हैं तो उन्हें इसकी पूरी इजाज़त है। ओमेगिद यानी लड़कियों की तरह जीवन जीना। ये शब्द गुना याला की मूल भाषा का शब्द है।
 
 
इस द्वीप पर थर्ड जेंडर का होना सामान्य बात है। यहां किसी को अपनी पहचान छिपाने की ज़रूरत नहीं होती। अगर किसी लड़के में महिलाओं वाले लक्षण नज़र आने लगते हैं तो, परिवार ख़ुद उसे महिलाओं की तरह रहने के तौर-तरीक़े सिखाने लगता है।
 
 
गुना की पौराणिक परंपरा
उन्हें वो सभी काम सिखाए जाते हैं जो उनके समाज में महिलाएं करती हैं। मिसाल के लिए इस द्वीप की महिलाएं दस्तकारी के काम में माहिर हैं। ओमेगिदों को इन महिलाओं के साथ रखा जाता है, जहां वो उनसे तमाम हुनर सीखते हैं। सभी महिलाओं और ओमेगिदों को मर्दों की तरह अपने फ़ैसले लेने का पूरा अख़्तियार है।
 
 
ब्राज़ील की साओ पाउलो यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर और रिसर्चर डिएगो माडी डियास के मुताबिक गुना समाज मातृसत्तात्मक है। यहां बच्चों के अधिकारों का ख़ास ख़्याल रखा जाता है। उन्हें माहौल दिया जाता है कि वो अपने दिल की बात सुनें और ख़ुद फ़ैसला करें। लिहाज़ा अगर किसी बच्चे में महिला वाली भावना आ जाती है तो उसे रोका नहीं जाता। वो जैसा है, समाज में उसे उसी रूप में स्वीकारा जाता है।
 
 
यहां देखा गया है कि अक्सर लड़कों में ही महिलाओं का रूप धारण करने की प्रवृत्ति ज़्यादा पैदा होती है। लड़कियों में लड़का बनने की ख़्वाहिश की दर बहुत ही कम है। लेकिन कोई लड़की अगर लड़का बन भी जाती है तो उसे भी समाज में उसी तरह स्वीकार किया जाता है, जैसे लड़के को लड़की बनने पर क़ुबूल किया जाता है।
 
 
पनामा सिटी में एलजीबीटीक्यू लोगों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाली नैन्डीन सोलिस ग्रेसिया का कहना है कि गुना में हमेशा ही ट्रांसजेंडर लोग रहे हैं। नैन्डीन का ताल्लुक़ भी गुना याला से है और वो ख़ुद भी ट्रांसजेंडर हैं। इतने बड़े पैमाने पर ट्रांसजेंडर होने का रिश्ता वो गुना की पौराणिक परंपराओं में देखी हैं। उनका कहना है कि गुना में इंसान की रचना को लेकर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं।
 
 
माना जाता है गुना याला में प्राचीन काल के जिस शख़्स ने ज़िंदगी जीने के क़ायदे-कानून बनाए वो ख़ुद मर्द और औरत दोनों था। उसकी बहन और छोटा भाई थर्ड जेंडर थे।
 
 
महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमता समाज
क्रैब द्वीप गुना याला का टूरिस्ट एरिया है। यहां सभी दुकानों में महिलाएं देखने को मिलती हैं जो ख़ूबसूरत कशीदाकारी वाले कपड़े पहने होती हैं। वो एक अच्छे दुकानदार की तरह डील करती हैं और ग्राहकों से ख़ूब बातें भी करती हैं।
 
 
गुना याला में शादी ब्याह की रस्में भी बाक़ी समाज से अलग हैं। यहां शादी के बाद दूल्हा रूख़सत होकर दुल्हन के घर जाता है। शादी के बाद पत्नी ही ये फ़ैसला करती है कि अब लड़का अपनी कमाई में अपने मां-बाप और भाई बहन को हिस्सेदार बनाएगा या नहीं।
 
 
गुना समाज महिलाओं के इर्द-गिर्द ही घूमता है। यहां तक कि जश्न भी महिलाओं को ध्यान में रखकर ही मनाए जाते हैं। मिसाल के लिए यहां जश्न के तीन मौक़े अहम हैं। पहला है लड़की का जन्म, दूसरा लड़की की प्यूबर्टी यानी मासिक धर्म की शुरुआत और तीसरा लड़की की शादी। इन सभी मौक़ों पर छिछा नाम की बियर नोश की जाती है और नाच गाना होता है।
 
 
गुना समाज की औरतें सोने के ज़ेवर पहनना पसंद करती हैं। इन ज़ेवरात के ज़रिए उन्हें समाज में अपनी स्थिति मज़बूत होने का एहसास होता है।
 
 
गुना समाज में मर्द आम तौर पर मछुआरे, शिकारी या किसान बनते हैं जबकि महिलाएं टूरिज़म सेक्टर में ज़्यादा सक्रिय हैं। इसके अलावा वो दस्तकारी करती हैं, जिससे उन्हें मर्दों के मुक़ाबले ज़्यादा कमाई हो जाती है। गुना औरतें बड़े पैमाने पर विनी और मोला बनाती हैं जो टूरिस्टों के बीच काफ़ी पसंद किए जाते हैं और ख़ूब बिकते हैं।
 
 
मर्दों से ज्यादा कमाती हैं औरतें
विनी कांच के मोतियों से बनी ब्रेसलेट को कहते हैं और मोला कशीदाकारी वाला एक ख़ास तरह का कपड़ा होता है, जिसका इस्तेमाल सजावट के लिए होता है। एक मोला तीस से पचास डॉलर में बिक जाता है।
 
 
जबकि मर्द सारा दिन मज़दूरी करने के बाद भी 20 डॉलर ही कमा पाते हैं। मर्दों और औरतों की कमाई में हमेशा फ़र्क़ देखने को मिलता है लेकिन इसके बावजूद उन्हें कमतर नहीं समझा जाता। ना ही काम के मामले में किसी तरह का वर्गीकरण नहीं है।
 
 
ख़ुद को विकसित कहने वाले समाज की तरह इनके यहां महिलाओं के काम और मेहनत को कम नहीं आंका जाता। उन्हें मर्दों के समान ही मज़दूरी और काम मिलता है।
 
 
ग्रेशिया के मुताबिक़ गुना याला में हाल के दिनों में सैलानियों के आने से टूरिज़म सेक्टर मज़बूत हुआ है। लेकिन इसी के साथ पश्चिमी देशों की कुछ बुरी आदतें भी आ गई हैं। पश्चिमी देशों के असर से अब गुना समाज में उथले स्तर पर एलजीबीटीक्यू लोगों के साथ भेद-भाव शुरू हो गया है। इसी वजह से कई थर्ड जेंडर्स ने गुना याला छोड़ पनामा सिटी में पनाह लेनी शुरू किया है।
 
 
हालांकि वो पनामा सिटी में पढ़ाई और अपने सपने साकार करने आए हैं, लेकिन सेक्स एजुकेशन की कमी के चलते वो एचआईवी जैसी जानलेवा बीमारी का शिकार हो जाते हैं। जब वो वापस गुना याला आते हैं तो यहां के लोगों को भी इस बीमारी में शामिल कर लेते हैं। हालांकि अब इस पर क़ाबू पाने के लिए विगुदन गालू नाम की संस्था बड़े स्तर पर काम कर रही है।
 
 
रिसर्चर ग्रेशिया का कहना है कि गुना याला में थर्ड जेंडर का होना कोई हैरान करने वाली बात नहीं है। ऐसे लोग हरेक समाज में हैं। भारत में इन्हें हिजड़ा या ज़नख़ा कहा जाता है, नेपाल में इन्हें मेती नाम दिया गया है। सोमा में फ़ाअफ़ाफ़ीन कहा जाता है और उत्तरी अमरीका में टू-स्प्रिट कहते हैं। फ़र्क़ बस इतना है कि ख़ुद को विकसित समाज कहने वालों के बीच ये लोग अलग-थलग रहते हैं। लेकिन, गुना याला समाज में इन्हें वही इज़्ज़त और जगह मिलती है जिसके वो हक़दार हैं।
 

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