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'ये कहना कि नोटबंदी सामूहिक लूट थी, ग़लत है'

Updated: गुरुवार, 9 नवंबर 2017 (10:52 IST)
- प्रोफ़ेसर जय देव अग्रवाल (आर्थिक मामलों के जानकार)
नोटबंदी एक बड़ा फैसला था जिसे सरकार ने ठीक एक साल पहले लिया था। फैसले के पीछे कुछ ऐसे कारण थे, जिसकी वजह से सरकार को यह कड़ा कदम उठाना पड़ा था। जैसे देश में नकली नोटों का प्रवाह, आतंकवादियों को आर्थिक मदद और तीसरा कालेधन पर लगाम।
 
विपक्ष और कुछ लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि सरकार कालेधन पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है? ऐसे में सरकार ने स्वैच्छिक योजना निकाली और लोगों से कहा कि वो कालेधन की घोषणा करे, टैक्स चुकाए और उसका हिसाब कर ले। इस योजना से सरकार बहुत सफलता नहीं मिली।
 
देश में नैतिकता
इसके बाद सरकार को नोटबंदी जैसा ठोस कदम उठाना पड़ा। नोटबंदी के एक साल बाद इसके बहुत सारे फायदे साफ-साफ नजर आ रहे हैं। यह भी सच है कि आम लोगों को काफी परेशानियां भी हुई हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा जो नजर आया, वो है नैतिकता। किसी भी देश में नैतिकता ज्यादा ज़रूरी हैं।
 
इस रास्ते में अगर किसी को कुछ नुकसान या परेशानी भी होती है तो उसे सहन करना चाहिए। देश में भ्रष्टाचार और कालाधन बहुत अधिक बढ़ जाए तो सरकार का यह फर्ज़ बनता है कि वो कुछ ऐसे कदम उठाए जिससे उस पर अंकुश लग सके।
 
बैंकों की लिक्विडिटी
देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों की कुल मूल्य 15.44 लाख करोड़ रुपये थी, उसमें से ज्यादातर सरकार से पास वापस आ गई। बैंकों का सबसे बड़ा काम है 'मोबिलाइजेशन ऑफ रिसोर्सेज' यानी संसाधनों का प्रवाह बना रहे। नोटबंदी से यह काम हुआ। हर व्यक्ति के पास 500 और हजार रुपए के नोट थे, उसे जमा कराने पड़े।
 
वो सारा पैसा बैंक में वापस आया। बैंकों की लिक्विडिटी बढ़ी। अब वो इस पैसे का निवेश कर पाएंगे, जो देश के काम आएगा। नोटबंदी से तीन लाख शेल कंपनियों का पता चला है, जो गलत कामों में लगी थी। इसके साथ ही एक बहुत बड़ा बदलाव आया है वो है डिजिटल लेन-देन का। भारत की इकॉनमी कैश बेस्ड इकॉनमी है।
 
इकॉनमी कैशलेस
इसमें यह स्कोप होता है कि टैक्स की चोरी की जाए। डिजिटल लेन-देन में से सभी प्रकार के लेन-देन सरकार की नजर में होते हैं। नोटबंदी के बाद डिजिटल लेन-देन 150 फीसदी बढ़ी है। ये कहना मुश्किल है कि नोटबंदी के बाद भारत की इकॉनमी कैशलेस हो गई, लेकिन लेसकैश जरूर हुई है।
 
23 से 24 प्रतिशत अधिक इनकम टैक्स रिटर्न भरे गए हैं। यह एक एक ऐसे देश के लिए अच्छी बात है जहां बहुत कम लोग रिटर्न फाइल करते हैं और टैक्स भरते हैं। जरूरी बात है कि पारदर्शिता बढ़ी है। सरकार भी इसके फायदे गिना रही है। नोटबंदी से जो नुकसान हुएं, वो है लोगों को लंबी-लंबी लाइनों में लगना पड़ा।
 
सरकार और देश
लोगों को कष्ट हुए, कुछ की मौत हो गई, कुछ को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा। गृहणियों ने जो पैसे इकट्ठा किए थे, चाहे वो गिफ्ट के रूप में मिले या घर खर्च के बचाया था, वो भी जमा कराने पड़े। इससे उन्हें निजी तौर पर नुक़सान ज़रूर हुआ लेकिन देश को फायदा हुआ। ये छिपे पैसा देश की अर्थव्यवस्था में आया।
 
कमी रही नोटबंदी को लागू करने में। बड़े लोगों ने कर्मियों और मजदूरों को नोट बदलने में लगा दिया। कुछ बैंक कर्मियों ने सरकार और देश को भी धोखा दिया। रातों-रात बैंक खोलकर प्रभावी लोगों के पैसे बदले गए। इन प्रभावी लोगों में उद्यमी, नेता शामिल थे। सरकार ने नोटबंदी के दौरान पुराने नोटों के लेन-देन में कुछ छूट भी दी थी।
 
मुद्रास्फीति पर अंकुश
जैसे कि पेट्रोल पंप, दवा दुकानें आदि पर पर पुराने नोट लिए जा रहे थे। यहां भी गलत तरीके से नोट बदले गए। लेकिन ये कहना कि नोटबंदी सामूहिक लूट थी, तो वो गलत है। लूट वो होती है, जब एक व्यक्ति उसे लेकर अपनी जेब में डाल लें और उसे खा जाए और उसका पता भी न लगने दे।
 
नोटबंदी में लोगों ने बैंकों में पैसा जमा कराया और ये पैसा रिजर्व बैंक के पास गया। इसका एक बड़ा फायदा यह हुआ कि मुद्रास्फीति की जो दर है, उस पर अंकुश लगा। जो लोग बेवजह खर्च करते थे, उनकी इन आदतों में कमी आई। सोने और हीरे की मांग घटी। मैं समझता हूं कि पिछले एक साल में इसके बहुत सारे फायदे हुए हैं।
 
चेक से भुगतान
यह योजना 60 प्रतिशत सफल रही है और आने वाले समय में दो तीन साल बाद इसके फायदे साफ नजर आने लगेंगे। ये बहुत ही अच्छा और समझबूझ वाला फैसला था। हां, इससे छोटे और बड़े दोनों प्रकार के रोजगारों को नुकसान हुआ। जैसे रियल स्टेट को नुकासन हुआ। उसमें 60 और 40 प्रतिशत का कालाधन चलता था।
 
कहीं-कहीं 60 प्रतिशत कालाधन और 40 प्रतिशत चेक से भुगतान होते थे। उसपर लगाम लगा। छोटे कारोबार पर नोटबंदी का बहुत असर नहीं हुआ। उन्हें जीएसटी का ज्यादा नुकसान हुआ है। कम पढ़े लिखे लोगों को जीएसटी फाइल करने में परेशानी हो रही है। लेकिन मैं समझता हूं कि नोटबंदी से नुक़सान ठेकेदारों को ज्यादा हुआ।
 
कारोबार पर असर
जहां 50 से 60 फीसदी लेन-देन कालधन में चलता था, वो बंद हुआ और यही नोटबंदी का लक्ष्य था। दूसरी चीज ये है कि नैतिकता किसी भी देश में लाने के लिए लोगों को किसी भी प्रकार का कष्ट या नुकसान सहना पड़े, तो वो नुकसान है मेरे विचार से बहुत बड़ा नहीं है।
 
अंततः ये देखना होगा कि हम अपने देश को एक स्वच्छ देश में रूप में आगे बढ़ाए। अगर हम लगातार लोगों को यह बताते रहें कि यह भ्रष्ट देश है, यहां कालाधन चलता है तो यह हमारी छवि के लिए खतरनाक है। भारत नैतिकता की तरफ बढ़ने के लिए तैयार दिख रहा है और कोशिश कर रहा है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी यह छवि बनी है।
 
(लेखक इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनांस के चेयरमैन हैं। यह लेख बीबीसी संवाददाता अभिमन्यु कुमार साहा से बातचीत पर आधारित है।)

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