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चीन में 5 साल में क्या-क्या बदला

Updated: मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017 (11:51 IST)
राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पांच सालों के शासनकाल में चीन संपन्न और ज़्यादा ताक़तवर हुआ है। लेकिन इस तरक्की से आम चीनियों के जनजीवन पर कितना असर पड़ा है?
 
चीन के सबसे ताक़तवर निर्णयकर्ता अगले हफ़्ते यह तय करने जा रहे हैं कि आने वाले पांच सालों के लिए देश की कमान किसके पास होगी। हमने चीनी प्रशासन और कई बड़े सर्वे की आंकड़े इकट्ठे किए हैं और पता करने की कोशिश की है कि चीनी परिवारों के जीवन और वहां के समाज में कैसी तब्दीली आई है।
चीन ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए लाई गई अपनी एक बच्चा पैदा करने की नीति को 2015 में ख़त्म कर दिया था। इस नीति का मूल उद्देश्य चीन की आबादी को नियंत्रित करना था लेकिन इससेलैंगिक असंतुलन बढ़ने लगा था। अब चीन के लोगों के लिए एक से अधिक बच्चे पैदा करने और परिवार बड़ा करने का रास्ता भले ही खुल गया हो लेकिन तलाक़ और विवाह के मामले में चीन में हालात विकसित देशों जैसे ही हैं। यहां अब शादियां कम हो रही हैं और तलाक़ों की दर में इज़ाफ़ा हो रहा है। हालांकि पहली नज़र में बनी ये राय ग़लत भी हो सकती है।
 
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी शंघाई में मनोविज्ञान के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर शुआन ली ने कहा, ''चीन में पहले भी और अब भी पश्चिम यूरोपीय देशों और अमरीका के मुक़ाबले तलाक़ की दरें कम हैं।''
"पड़ोसी देशों और क्षेत्रों के मुक़ाबले चीन के मुख्यभूभागक के नागरिकों में शादी की दर ज़्यादा है। ऐसे में यह कहना कि चीन में परिवार टूट रहे हैं सांख्यिकीय रूप से निराधार है।" चीन ने भले ही 2015 में अपनी एक बच्चा पैदा करने की नीति को ख़त्म कर दिया है लेकिन इसके प्रभाव दूरगामी रहेंगे। यहां तक की तीस साल से अधिक उम्र के अविवाहित लोगों के लिए यहां एक ख़ास शब्द भी है, शैंगनैन या "छोड़े गए पुरुष"।
 
ख़बरों के मुताबिक़ 2015 में एक एक चीनी व्यापारी ने शंघाई स्थित एक वैवाहिक एजेंसी पर लड़की तलाशने में नाकाम रहने पर मुक़दमा किया था। उस व्यापारी ने एजेंसी को अपने लिए लड़की ढूंढने के लिए लगभग 10 लाख डॉलर दिए थे।
 
ऑक्सफर्ड इकोनॉमिक्स के लुईस कुइज का कहना है, ''चीन की एक बच्चे की नीति ने जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में बदलाव को और बढ़ाया है। जन्म दर में गिरावट और बुज़ुर्ग होती आबादी के कारण कामकाजी समूहों पर दबाव बढ़ा है जिसका असर आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ा है।''
एक बच्चा पैदा करने की नीति को भले ही जनवरी 2016 में दो बच्चे पैदा करने की नीति में बदल दिया गया हो लेकिन लुईस का अनुमान है कि इसका असर कामकाजी वर्ग में क़रीब दो दशकों में दिखेगा। लेकिन बढ़ रहा जीवनस्तर पारंपरिक लैंगिक धारणाओं को भी प्रभावित कर रहा है और इसका असर लैंगिक असंतुलन पर सकारात्मक रूप से पड़ेगा।
 
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में सेंटर फॉर फैमिली एंड पॉपुलेशन रिसर्च के प्रोफ़ेसर मु शेंग कहते हैं कि 'लैंगिक असमानता में बदलाव हो रहा है।'
 
उन्होंने कहा, ''ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रजनन की नीति में बदलाव हुआ है। लोगों का रवैया बदला है। महिलाओं की भागीदारी पढ़ाई से लेकर नौकरी तक में बढ़ी है। अभी ज़्यादा भरोसेमंद सामाजिक सुरक्षा सिस्टम भी है।'' हालांकि अभी वर्तमान लैंगिक असामनता में किसी भी पुरुष के लिए पत्नी ढूंढना काफ़ी मुश्किल काम है।
अपना घर
घरों पर मालिकाना हक़ के मामले में चीन के युवा अमकीका और यूरोपीय देशों के युवाओं के मुक़ाबाले में बहुत आगे हैं। साल 2000 के बाद पैदा हुए चीन के करीब 70 प्रतिशत युवाओं के पास अपना घर होगा। चीन में माता-पिता कोशिश करते हैं कि वो अपने बच्चों के लिए घर मुहैया करा सकें। वो ऐसा इसलिए भी करते हैं कि उन्हें शादी के लिए लड़की की तलाश में आसानी हो।
 
चीन में घरों पर मालिकाना हक़ को लेकर एचएसबीसी एक सर्वे किया है। एचएसबीसी ने जब अप्रैल में इस सर्वे को जारी किया तो एसओएएस चाइना इंस्टिट्यूट के उपनिदेशक डॉ जीयू लियू ने बीबीसी से कहा था, "यह रिवाज़ है कि पति एक घर मुहैया कराएगा।"

लीयू कहते हैं, "कई प्रेम कहानियां सिर्फ़ इसलिए शादी के अंजाम तक नहीं पहुंच पाती क्योंकि पुरुष घर मुहैया नहीं करा सके।"
ऐसे में कई प्रेम कहानियां तो शादी तक पहुंचने में इसलिए नाकाम रहीं क्योंकि वो घर मुहैया नहीं करा सके। इसलिए चीन में शादी के लिए संपत्ति का होना काफ़ी मददगार साबित होता है। आकर्षण, क़िस्मत या फिर संपत्ति के दम पर जब एक बार पुरुषों को जीवनसाथी मिल जाता है तो चीन में पारिवारिक जीवन कैसा होता है?
 
शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में चीन में औसत आय में लगातार वृद्धि हुई है। बीते दशकों में एक और जहां खाद्य ज़रूरतों पर ख़र्चे कम हुए हैं वहीं स्वास्थ्य सेवाओं, कपड़ों, यातायात और अन्य चीज़ों पर ख़र्चे बढ़े हैं।
 
मोबाइल फ़ोन
संचार माध्यमों पर भी ख़र्च बढ़ा है। मोबाइल फ़ोन की बढ़ती संख्या इस बात को साबित करती है। चीन में स्मार्टफ़ोन सिर्फ़ संचार पर हुआ कोई अन्य ख़र्चा नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर वीचैट एप्लीकेशन आम जनजीवन का हिस्सा बन चुकी है और फ़ोन के बिना जीवन की कल्पना अब मुश्किल है।
 
बढ़ती हुई आय का असर शिक्षा ख़र्च पर भी हुआ है। अब बच्चों की पढ़ाई पर अधिक ख़र्च किया जा रहा है और अभिभावक बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भी भेज रहे हैं। विदेश पढ़ने गए चीनी छात्र अब अपने देश भी लौट रहे हैं।
 
शोध संस्थान आईएचएस मार्केट में एशिया-पैसिफ़िक क्षेत्र के लिए मुख्य अर्थशास्त्री राजीव बिस्वास कहते हैं, "विदेश पढ़ने गए छात्रों में से अधिकतर वापस लौट रहे हैं। साल 2016 में 433000 छात्र चीन लौटे।"
 
बिस्वास कहते हैं, "विदेश से पढ़ाई करके लौटे ये चीनी युवा चीन के व्यापार और राजनीति जगत की अगली पीढ़ि के नेता होंगे। अगले दशक में जब चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा तब इन युवाओं की अंतरराष्ट्रीय सोच और बाहरी संस्कृतियों की समझ और महत्वपूर्ण हो जाएगी।"
 
यूरोपीय या अमरीकी यूनीवर्सिटी से डिग्री एक ओर जहां बाज़ार में नौकरी की संभावना बढ़ा देती है वहीं इससे सही जीवनसाथी मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है।

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