आस्था से खिलवाड़ करते भक्ति मैसेज-1

भक्ति मैसेजेस भेजकर आनंदित होते युवा

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आस्था के खिलवाड़ कोई नई बात नहीं है। सूचना क्राँति के इस में का उपयोग किया जाने लगा है तो पहले पत्रों के माध्यम से यह होता था। कोई इस्तेमाल करता था तो चिट्ठी-पत्री को माध्यम बनाता था। मौजूदा समय में मोबाइल का उपयोग किया जा रहा है।


पिछले कुछ समय से युवाओं में यह चलन खास होता जा रहा है। कुछ देर की हँसी, मजाक के लिए धार्मिक आस्थाओं को ताक पर रख रहे युवा ऐसे संदेशों को भेजकर तो आनंदित होते हैं, लेकिन स्वाभाविक तौर देखा जाए तो युवा आधुनिकता होड़ में यह भूल जाते है कि वे खुद अपनी धार्मिक सहिष्णुता को संदेशों के माध्यम से व्यक्त कर रहे।
इन संदेशों को भेजने वालों की धारणा भी जाहिर तौर पता लग जाती है। वे अपने आराध्य को पूजने के बजाय उन्हें मजाकिया रूप बनाकर पेश कर रहे है। यह खुद भेजने वाले की संकुचित सोच का नतीजा होते हैं।

इस विषय पर राजेन्द्र तिवारी का कहना है कि पहले पोस्टकार्ड के माध्यम से आस्था से भरे हुए ऐसे संदेश लोगों द्वारा भेजे जाते थे। जिनमें भी ईश्वर की स्तुति उपरांत पूर्ण होने वाली मनोकामना के उल्लेख के साथ भी ऐसी अप्रत्यक्ष धमकी रहती थी, लेकिन अब उन पोस्टकार्ड की जगह मोबाइल के इन भक्ति मैसेज ने ले ली है।
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जिसके चलते मनोकामना पूर्ण होने एवं बड़ा पुण्य लाभ कमाने की चाहत ने मोबाइल पर ऐसे संदेशों की बाढ़-सी ला दी है। जो लोगों में एक झूठी आस तो बाँधते ही हैं, वहीं इस तरह के मैसेज से तकनीक का गलत उपयोग भी हो रहा है।

साँईंबाबा, दुर्गा माँ, भगवान गणेश, शंकर भगवान, हनुमान जी, राम आदि नामों से आने वाले इस मैसेज को पढ़ने के बाद लोगों के मन में एक भ्रम जरूर बैठ जाता है, जिसके चलते वह अपने इस अंधविश्वास के नाम 10 या 20 मैसेज तो लोगों को भेज ही देते हैं।
सोनम पटेवार के अनुसार इस तरह के संदेश लोगों को भ्रमित करते हैं, तो वहीं लोगों के अंधविश्वास को भी बढ़ाते हैं। जिससे सुविधाजनक मोबाइल कभी-कभी तकलीफ का सबब बन जाता है। क्योंकि जो लोग इन मैसेज को ट्राँसफर नहीं करते हैं और उनके साथ कुछ बुरा हो जाता है, तो वह उस घटना को इन्हीं संदेशों का दुष्परिणाम मानते हैं।



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