प्रथमोऽध्यायः (संस्कृत में)

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सत्यनारायणस्यैवं व्रतं सम्यग्विधानतः ।

कृत्वा सद्यः सुखं भुक्त्वा परत्र मोक्षमाप्युयात्‌ ।
तच्छुत्वा भगवद्वाक्यं नारदो मुनिरब्रवीत्‌ ॥15॥

नारद उवा
किं फलं किं विधानं च कृतं केनैव तद्व्रतम्‌ ।
तत्सर्वं विस्तराद् ब्रूहि कदा कार्यं हि तद्व्रतम्‌ ॥16॥

श्रीभगवानुवा
दुःखशोकादिमनंधनधान्यप्रवर्धनम्‌ ॥17॥
सौभाग्यसन्ततिकरं सर्वत्रविजयप्रदम्‌ ।
यस्मिन्कस्मिन्दिने मर्त्यो भक्ति श्रद्धासमन्वितः ॥18॥

सत्यनारायण का व्रत विधिपूर्वक करने से तत्काल सुख मिलता है और अंततः मोक्ष का अधिकार मिलता है। श्री भगवान के वचन सुन नारद ने कहा कि प्रभु इस व्रत का फल क्या है? इसे कब और कैसे धारण किया जाए और इसे किस-किस ने किया है। श्री भगवान ने कहा दुःख-शोक दूर करने वाला, धन बढ़ाने वाला। सौभाग्य और संतान का दाता, सर्वत्र विजय दिलाने वाला श्री सत्यनारायण व्रत मनुष्य किसी भी दिन श्रद्धा भक्ति के साथ कर सकता है।
सत्यनारायणं देवं यजेच्चैव निशामुखे ।
ब्राह्मणैर्बान्धवैश्चैव सहितो धर्मतत्परः ॥19॥

नैवेद्यं भक्तितो दद्यात्सपादं भक्ष्यमुत्तमम्‌ ।
रंभाफलं घृतं क्षीरं गोधूममस्य च चूर्णकम्‌ ॥20॥

अभावेशालिचूर्णं वा शर्करा वा गुडस्तथा ।सपादं सर्वभक्ष्याणि चैकीकृत्य निवेदयेत्‌ ॥21॥

विप्राय दक्षिणां दद्यात्कथां श्रुत्वाजनैः सह ।
ततश्चबन्धुमिः सार्धं विप्रांश्च प्रतिभोजयेत्‌ ॥22॥

सायंकाल धर्मरत हो ब्राह्मण के सहयोग से और बंधु बांधव सहित श्री सत्यनारायण का पूजन करें। भक्तिपूर्वक खाने योग्य उत्तम प्रसाद (सवाया) लें। यह प्रसाद केले, घी, दूध, गेहूँ के आटे से बना हो। यदि गेहूँ का आटा न हो, तो चावल का आटा और शकर के स्थान पर गुड़ मिला दें। सब मिलाकर सवाया बना नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद कथा सुनें, प्रसाद लें, ब्राह्मणों को दक्षिणा दें और इसके पश्चात बंधु-बांधवों सहित ब्राह्मणों को भोजन कराएँ।
प्रसादं भक्षयभ्दक्त्या नृत्यगीतादिकं चरेत्‌ ।
ततश्च स्वगृहं गच्छेत्सत्यनारायणं स्मरन्‌ ॥23॥

एवंकृते मनुष्याणां वांछासिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्‌ ।
विशेषतः कलियुगे लघूपायऽस्ति भूतले ॥24॥

प्रसाद पा लेने के बाद कीर्तन आदि करें और फिर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए स्वजन अपने-अपने घर जाएँ। ऐसे व्रत-पूजन करने वाले की मनोकामना अवश्य पूरी होगी। कलियुग में विशेष रूप से यह छोटा-सा उपाय इस पृथ्वी पर सुलभ है।
॥ इति श्रीस्कन्द पुराणे रेवाखण्डे ॥

सत्यनारायण व्रत कथायां प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥


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