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चतुर्थोऽध्यायः (संस्कृत में)

मंगलवार,दिसंबर 3, 2013
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पूर्व समय में उल्कामुख नाम का बुद्धिमान राजा था। वह जितेन्द्रिय एवं सत्यवादी था। वह नित्य देवालयों में जाता और दान-दक्षिणा द्वारा ब्राह्मणों को संतुष्ट रखता था। उसकी कमल जैसे मुखवाली सती रानी थी। यह राजा-रानी भद्रशीला नदी के तट पर सत्य नारायण का ...
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श्री सत्यनारायण व्रत-पूजनकर्ता पूर्णिमा या संक्रांति के दिन स्नान करके कोरे अथवा धुले हुए शुद्ध वस्त्र पहनें, माथे पर तिलक लगाएँ और शुभ मुहूर्त में पूजन शुरू करें। इस हेतु शुभ आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके सत्यनारायण भगवान का पूजन करें।
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हाथ में अक्षत लेकर श्री सत्यनारायण भगवान का ध्यान करें- ॐ सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितंच सत्ये । सत्यस्य सत्यामृत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥
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पूजन सामग्री

शनिवार,मई 19, 2012
धूप बत्ती (अगरबत्ती) कपूर केसर चंदन यज्ञोपवीत 5 कुंकु चावल अबीर गुलाल, अभ्रक हल्दी आभूषण नाड़ा रुई रोली, सिंदूर सुपारी, पान के पत्ते पुष्पमाला, कमलगट्टे धनिया खड़ा सप्तमृत्तिका सप्तधान्य कुशा व दूर्वा पंच मेवा
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सूतजी ने कहा- इस व्रत को पहले किसने किया? अब मैं आपको सुनाता हूँ। बहुत रमणीय काशीपुरी में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह भूख-प्यास से दुखित यहाँ-वहाँ भटकता रहता था। इस ब्राह्मण को दुःखी देख
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जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक-हरणा ॥ जय लक्ष्मी... ॥ रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे । नारद करत नीराजन, घंटा वन बाजे
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पंचम अध्याय

शनिवार,मई 19, 2012
श्री सूतजी ने आगे कहा- 'हे ऋषियों! मैं एक और भी कथा कहता हूँ। उसे भी सुनो। प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भगवान सत्यदेव का प्रसाद त्याग कर बहुत दुःख पाया। एक समय राजा वन में वन्य पशुओं को मारकर बड़ के वृक्ष के नीचे आया।
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चतुर्थ अध्याय

शनिवार,मई 19, 2012
श्री सूतजी ने आगे कहा- 'वैश्य और उसके जमाई ने मंगलाचार करके यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल पड़े। उनके थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर दंडी वेषधारी श्री सत्यनारायण भगवान ने उससे पूछा- 'हे साधु! तेरी नाव में क्या है?'
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तृतीय अध्याय

शनिवार,मई 19, 2012
श्री सूतजी ने कहा- 'हे श्रेष्ठ मुनियों! अब एक और कथा कहता हूँ। पूर्वकाल में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देवस्थानों पर जाता तथा गरीबों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था।
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एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि हजारों ऋषि-मुनियों ने पुराणों के महाज्ञानी श्री सूतजी से पूछा कि वह व्रत-तप कौन सा है, जिसके करने से मनवांछित फल प्राप्त होता है। हम सभी वह सुनना चाहते हैं। कृपा कर सुनाएँ।
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द्वितीय अध्याय

शनिवार,मई 19, 2012
सूतजी ने कहा- 'हे ऋषियों! जिन्होंने पहले समय में इस व्रत को किया है। उनका इतिहास कहता हूँ आप सब ध्यान से सुनें। सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण भूख और प्यास से बेचैन होकर पृथ्वी पर घूमता रहता था।
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प्रथम अध्याय

शनिवार,मई 19, 2012
व्यास जी ने कहा- एक समय की बात है। नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक अठ्ठासी हजार ऋषियों नेपुराणवेत्ता श्री सूतजी से पूछा- हे सूतजी! इस कलियुग में वेद-विद्यारहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिलेगी तथा उनका उद्धार कैसे होगा? हेमुनिश्रेष्ठ!
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भगवान श्री सत्यनारायण की व्रत कथा आस्थावान हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए चिरपरिचित कथा है। संपूर्ण भारत में इस कथा के प्रेमी अनगिनत संख्या में हैं, जो इस कथा और व्रत का नियमित पालन व पारायण करते हैं।
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