जानिए, परम सिद्ध नौ नाथों को

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: गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे। गोरक्षनाथ के जन्मकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं। राहुल सांकृत्यायन इनका जन्मकाल 845 ई. की 13वीं सदी का मानते हैं। नाथ परंपरा की शुरुआत बहुत प्राचीन रही है, किंतु गोरखनाथ से इस परंपरा को सुव्यवस्थित विस्तार मिला। दोनों को चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण है कि ईस्वी 13वीं शताब्दी में गोरखपुर का मठ मुस्लिमों ने ढहा दिया गया था, इसीलिए इसके बहुत से पूर्व गोरखनाथ का समय होना चाहिए।

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गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है। इनके नाम पर एक नगर का नाम गोरखपुर है। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरंभकर्ता माने जाते हैं। गोरखपंथी साहित्य के अनुसार आदिनाथ स्वयं भगवान शिव को माना जाता है। शिव की परंपरा को सही रूप में आगे बढ़ाने वाले गुरु मत्स्येन्द्रनाथ हुए। गोरखनाथ से पहले अनेक संप्रदाय थे, जिनका नाथ संप्रदाय में विलय हो गया। शैव एवं शाक्तों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन तथा वैष्णव योग मार्गी भी उनके संप्रदाय में आ मिले थे।

काबुल, गांधार, सिंध, बलोचिस्तान, कच्छ और अन्य देशों तथा प्रांतों में यहां तक कि मक्का-मदीना तक श्रीगोरक्षनाथ ने दीक्षा दी थी और नाथ परंपरा को विस्तार दिया।

गोरक्षनाथ जन्म : जनश्रुति अनुसार एक बार श्रीमत्स्येन्द्रनाथजी भ्रमण करते हुए गोदावरी नदी के किनारे चन्द्रगिरि नामक स्थान पर पहुंचे और सरस्वती नाम की स्त्री के द्वार पर भिक्षा मांगने लगे। नि:संतान स्त्री भिक्षा लेकर बाहर आई, लेकिन वह उदास थी। श्रीमत्स्येन्द्रनाथजी ने उसे विभूति देकर कहा कि इसे खा लेना, पुत्र प्राप्ति होगी। लेकिन अनजान भय के कारण उस महिला ने सिद्ध विभूति को एक झोपड़ी के पास गोबर की ढेरी पर रख दिया।

12 साल बाद श्रीमत्स्येन्द्रनाथजी फिर वहीं पहुंचे और सरस्वती से उस बालक के बारे में पूछा। सरस्वती ने विभूति को गोबर की ढेरी पर रखने की बात बता दी। इस पर मत्स्येन्द्रनाथ ने कहा, 'अरे माई, वह विभूति तो अभिमंत्रित थी- निष्फल हो ही नहीं सकती। तुम चलो, वह स्थान तो दिखाओ।' उन्होंने अलख निरंजन की आवाज लगाई और गोबर की ढेरी से निकलकर 12 साल का एक बालक सामने आ गया। गोबर में रक्षित होने के कारण मत्स्येन्द्रनाथजी ने बालक का नाम गोरक्ष रखा और अपना शिष्य बनाकर अपने साथ ले गए। गोरखनाथ के जन्म के बारे में कई अन्य जनश्रुतियां भी हैं।

गोरखनाथ के ग्रंथ : नाथ योगी गोरखनाथजी ने संस्कृत और लोकभाषा में योग संबंधी साहित्य की रचना की है- गोरक्ष-कल्प, गोरक्ष-संहिता, गोरक्ष-शतक, गोरक्ष-गीता, गोरक्ष-शास्त्र, ज्ञान-प्रकाश शतक, ज्ञानामृतयोग, महार्थ मंजरी, योग चिन्तामणि, योग मार्तण्ड, योग-सिद्धांत-पद्धति, हठयोग संहिता आदि।

गोरखनाथ की तपोभूमि और धाम : गोरखनाथजी ने नेपाल और भारत की सीमा पर प्रसिद्ध शक्तिपीठ देवीपातन में तपस्या की थी, उसी स्थल पर पाटेश्वरी शक्तिपीठ की स्थापना हुई। भारत के गोरखपुर में गोरखनाथ का एकमात्र प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर को यवनों और मुगलों ने कई बार ध्वस्त किया लेकिन इसका हर बार पु‍नर्निर्माण कराया गया। 9वीं शताब्दी में इसका जीर्णोद्धार किया गया।

नेपाल के परम सिद्ध योगी : नेपाल की राजकीय मुद्रा (सिक्के) पर श्रीगोरक्ष का नाम है और वहां के निवासी गोरक्ष ही कहलाते हैं। गोरखा नाम की सेना गुरु गोरक्षनाथ की रक्षा के लिए ही थी। दरअसल, नेपाल के शाह राजवंश के संस्थापक महाराज पृथ्वीनारायण शाह को गोरक्षनाथ से ऐसी शक्ति मिली थी जिसके बल पर उन्हें खंड-खंड में विभाजित नेपाल को एकजुट करने में सफलता मिली, तभी से नेपाल की राजमुद्रा पर श्रीगोरक्षनाथ नाम और राजमुकुटों में उनकी चरणपादुका का चिह्न अंकित है।

गुरु गोरखनाथजी के नाम से ही नेपाल के गोरखाओं ने नाम पाया। नेपाल का गोरखा जिले का नाम भी भी गुरु गोरखनाथ के नाम पर ही पड़ा। गुरु गोरखनाथ सबसे पहले यहीं दिखे थे। यहां एक गुफा है, जहां गोरखनाथ का पग चिह्न है और उनकी एक मूर्ति भी है। यहां हर साल वैशाख पूर्णिमा को एक उत्सव मनाया जाता है जिसे रोट महोत्सव कहते हैं और यहां मेला भी लगता है।

गोरखधंधा : जनश्रुति अनुसार उन्होंने कई कठ‍िन (आड़े-त‍िरछे) आसनों का आविष्कार भी किया। उनके अजूबे आसनों को देख लोग अ‍चम्भित हो जाते थे। आगे चलकर कई कहावतें प्रचलन में आईं। जब भी कोई उल्टे-सीधे कार्य करता है तो कहा जाता है कि 'यह क्या गोरखधंधा लगा रखा है।'

गोरखपंथी : गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित 'योगिसंप्रदाय' मुख्य रूप से बारह शाखाओं में विभक्त है। इसीलिए इसे 'बारहपंथी' कहते हैं। (1) भुज के कंठरनाथ, (2) पागलनाथ, (3) रावल, (4) पंख या पंक, (5) वन, (6) गोपाल या राम, (7) चांदनाथ कपिलानी, (8) हेठनाथ, (9) आई पंथ, (10) वेराग पंथ, (11) जैपुर के पावनाथ और (12) घजनाथ।

उक्त सारे संप्रदाय में शैव, शाक्त और नाथ के सभी संप्रदाय सम्मिलित हो गए थे।
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