धर्मयात्रा की इस कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं नाथ संप्रदाय के नौ नाथ में से एक कानिफनाथ महाराज के समाधि स्थल पर। महाराष्ट्र की सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में गर्भगिरि पर्वत से बहने वाली पौनागिरि नदी के पास ऊँचे किले पर मढ़ी नामक गाँव बसा हुआ है और यहीं है इस महान संत की समाधि।इस किले पर श्री कानिफनाथ महाराज ने 1710 में फाल्गुन मास की वैद्य पंचमी पर समाधि ली थी, जहाँ लाखों श्रद्धालुओं की आस्था बसी हुई है। इस किले के तीन प्रवेश द्वार हैं। कहा जाता है कि यहाँ की रानी येसूबाई ने कानिफनाथ महाराज से अपने पति छत्रपति शाहू की औरंगजेब बादशाह की कैद से रिहाई के लिए मन्नत माँगी थी। मन्नत पूरी होने पर उन्होंने मंदिर व किले का निर्माण कराया। फोटो गैलरी के लिए क्लिक करें। इस मंदिर के निर्माण कार्य में यादव, कैकाडी, बेलदार, वैद्य, गारुड़ी, लमाण, भिल्ल, जोशी, कुंभार और वडारी सहित कई जाति-वर्ग के लोगों ने अपना तन-मन और धन से सहयोग दिया। इसलिए इस तीर्थस्थल को दलितों के पंढरी नाम से भी जाना जाता है। यहाँ के कई समुदाय श्री कानिफनाथ महाराज को कुल देवता के रूप में पूजते हैं। इस जिले के गर्भगिरि पर्वत पर श्री कानिफनाथ महाराज के साथ ही गोरक्षनाथ, मच्छिंद्रनाथ, गहिनीनाथ और जालिंदरनाथ महाराज की भी समाधियाँ स्थापित हैं। कहा जाता है कि कानिफनाथ महाराज हिमालय में हाथी के कान से प्रकट हुए थे। कानिफनाथ महाराज ने बद्रीनाथ में भागीरथी नदी के तट पर 12 वर्ष तपस्या की और कई वर्ष जंगलों में गुजार कर योग साधना की। तत्पश्चात उन्होंने दीन-दलितों को अपने उपदेशों के माध्यम से भक्तिमार्ग पर प्रशस्त होने की भावना जागृत की। उन्होंने दलितों की पीड़ा दूर करने के विषय पर साबरी भाषा में कई रचनाएँ कीं। कहते हैं इन रचनाओं के गायन से रोगियों के रोग दूर होने लगे। आज भी लोग अपने कष्ट निवारण के लिए महाराज के द्वार पर चले आते हैं। ऐसा माना जाता है कि डालीबाई नामक एक महिला ने नाथ संप्रदाय में शामिल होने के लिए श्री कानिफनाथ महाराज की कठोर तपस्या की थी। फाल्गुन अमावस्या के दिन डालीबाई ने समाधि ली थी। समाधि लेते समय कानिफनाथ ने अपनी शिष्या को स्वयं प्रकट होकर दर्शन दिए थे। इसी समाधि पर कालांतर में एक अनार का वृक्ष उग आया। कहते हैं कि इस पेड़ पर रंगीन धागा बाँधने से भक्तों की सारी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं।आज भी मंदिर परिसर में गाँव की पंचायत लगती है जहाँ लोगों के आपसी झगड़ों को न्यायपूर्वक सुलझाया जाता है इसलिए इस तीर्थक्षेत्र को सर्वोच्च न्यायालय समझा जाता है। कैसे जाएँ:-हवाई मार्ग:- अहमदनगर से पुणे हवाईअड्डा सबसे निकट है। पुणे से अहमदनगर 180 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।रेल मार्ग:- अहमदनगर पहुँचने के लिए पुणे से रेल सेवा उपलब्ध है।सड़क मार्ग:- मढ़ी गाँव अहमदनगर से 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ पहुँचने हेतु सरकारी बस या निजी वाहन उपलब्ध हैं।
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