देवास का महाकालेश्वर मंदिर

जहाँ के शिवलिंग का आकार लगातार बढ़ रहा है...

Shruti AgrawalWD

क्यभगवान अपने भक्तों के कल्याण के लिए स्वयं प्रकट होते हैं? एक सजीव व्यक्ति की तरह क्या मूर्तियों का भी आकार बढ़ता है? क्या चमत्कार वास्तविक होते हैं? ये कुछ ऐसे अबूझ प्रश्न हैं, जिनका जवाब कोई नहीं जानता, लेकिन हर धर्म के अनुयायी कभी न कभी ऐसे चमत्कारों से कथित तौर पर रूबरू जरूर होते हैं। कभी किसी वृक्ष में उन्हें अपने ईष्ट नजर आते हैं, तो कभी प्रसाद अपने आप गायब हो जाता है। इस बार आस्था और अंधविश्वास की अपनी प्रस्तुति में हम ऐसे ही एक मंदिर में पहुँचे। अब इस मंदिर से जुड़ा यह चमत्कार आस्था है या कोरा अंधविश्वास, यह आप ही तय कीजिए।
मंदिर में प्रतिष्ठित लिंग काफी कुछ उज्जैन के महाकाल के शिवलिंग की तरह ही लग रहा था...बस यह बात अजीब थी कि जहाँ महाकाल का शिवलिंग क्षरण के कारण लगातार घट रहा है वहीं लोगों का दावा है कि यहाँ का शिवलिंग लगातार बढ़ रहा है।
आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हम आपको रूबरू करवा रहे हैं देवास के महाकालेश्वर मंदिर से। इस मंदिर से हजारों लोगों की आस्था जुड़ी है। मंदिर के आसपास रहने वाले और यहाँ नियम से दर्शन करने आने वाले लोगों का कहना है कि यहाँ का शिवलिंग न सिर्फ स्वयंभू है, बल्कि हर साल इसकी ऊँचाई लगातार बढ़ रही है, जो अपने आप में एक चमत्कार है। इस चमत्कार की बात सुनकर हमने मंदिर से जुडे़ हुए लोगों से संपर्क किया।

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जब हम मंदिर में पहुँचे तो कुछ श्रद्धालु शिवभक्ति में लीन थे। इन लोगों को विश्वास था कि यहाँ माँगी गई मनौतियाँ जरूर पूरी होंगी। मंदिर में प्रतिष्ठित लिंग काफी कुछ उज्जैन के महाकाल के शिवलिंग की तरह ही लग रहा था। बस यह बात अजीब थी कि जहाँ महाकाल का शिवलिंग क्षरण के कारण लगातार घट रहा है, वहीं लोगों का दावा है कि यहाँ का शिवलिंग लगातार बढ़ रहा है।

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मंदिर के समीप रहने वाले राधाकृष्ण मालवीय का कहना है कि वे बचपन से इस शिवलिंग की आराधना करते आए हैं। उन्होंने खुद इस शिवलिंग को आकार बदलते अर्थात बढ़ते हुए देखा है। इनका दावा है कि हर शिवरात्रि के दिन यह शिवलिंग एक तिल के आकार का बढ़ जाता है।

शुरू में तो किसी को भी पता नहीं चला था, परंतु चार-पाँच साल बाद सभी को अहसास होने लगा कि शिवलिंग लगातार बढ़ रहा है। अब इसकी ऊँचालिंग के मूल रूप की तुलना में काफी बढ़ चुकी है। इस शिवलिंग के स्वयंभू होने के पीछे भी एक कथा है।
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कहते हैं आज से लगभग सौ साल पहले जब देवास एक गाँव था और यहाँ यातायात के अच्छे साधन नहीं थे, उस समय गौरीशंकर पंडित नामक व्यक्ति महाकाल के परम भक्त थे। वे रोज सुबह महाकाल के दर्शन करने के बाद ही अन्न ग्रहण करते थे। उनका यह नियम अटूट था। एक बार मूसलधार बारिश होने के कारण देवास-उज्जैन मार्ग का नाला उफन गया और वे उज्जैन नहीं जा पाए।

" अपने आराध्य के दर्शन नहीं कर पाने के कारण गौरीशंकरजी ने अन्न-जल त्याग दिया। इस बार बारिश ने रुकने का नाम नहीं लिया और गौरीशंकर जीवन के अंतिम क्षण गिनने लगे। वे मृत्यु के करीब ही थे क‍ि तभी उन्हें भोलेशंकर ने दर्शन दिए और वरदान माँगने को कहा। गौरीशंकर ने प्रभु से नित्य दर्शन का वरदान माँगा। प्रभु ने आशीर्वाद दिया कि जहाँ भी वे पाँच बिल्वपत्र रखेंगे वहीं महाकाल प्रकट होंगे।"

श्रुति अग्रवाल|
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