अल्लाह तआला के 99 नाम

संकलन : श्रीमती अनीसा बेगम

WD|
ND

अल्लाह के पवित्र ना
- बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रही

अल्लाह तआला के नामों के बारे में बुजुर्गों ने कहा है कि अल्लाह त'आला के तीन हजार नाम हैं। एक हजार अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता और एक हजार वे हैं, जो फरिश्तों के सिवा कोई नहीं जानता और एक हजार वे जो पैगम्बरों से हम तक पहुंचे हैं, जिनमें से तीन सौ तौरेत में, तीन सौ जबूर में, तीन सौ इन्जील में और एक सौ कुरआन में दिए गए हैं।
मशहूर है कि कुरआन में 99 (निन्यानवें) नाम ऐसे हैं, जो सब पर जाहिर हैं और एक नाम ऐसा है, जो गुप्त रखा है जो 'इस्मे आजम' है। विभिन्न सहाबए अकराम ने इसे 'इस्मे आजम' के जो संकेत दिए हैं, वे किसी एक नाम से नहीं हैं।

भिन्न-भिन्न नामों को इस्मे आजम बताया गया है, जिससे इस निर्णय पर पहुंचना सरल है कि हर नाम 'इस्मे आजम' है और हर नाम किसी की जात से सम्बद्ध होकर वह नाम उसके लिए 'इस्मे आजम' का काम देता है। और खुदा के सब नाम अच्छे ही अच्छे हैं, तो उसको उसके नामों से पुकारा करो।
ND
हदीस शरीफ में आया है कि रसूल-अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया कि-

अल्लाह त'आला के 'अस्मा-ए-हुस्ना' जिनके साथ हमें दुआ मांगने का हुक्म दिया गया है, 99वें हैं। जो व्यक्ति इनको याद कर लेगा और उनको पढ़ता रहेगा वह जन्नत में जाएगा।
इस हदीस में जिन 99 नामों का वर्णन है, उनमें से अधिकतर नाम कुरआन करीम में दिए गए हैं। केवल कुछ नाम ऐसे हैं, जो बिल्कुल उसी रूप में कुरआन में नहीं हैं, लेकिन उनका भी स्रोत, जिससे वे नाम निकले हैं, क़ुरआन में दिए हैं, जैसे 'मुन्तक़िम' तो क़ुरआन में नहीं है मगर 'ज़ुनतिक़ाम' क़ुरआन में आया है।

अल्लाह त'आला के 'अस्मा-ए-हुस्ना' जिनका जिक्र आयत 'व लिल्लाहिल अस्मा उल हुस्ना फदऊहो बिहा' (और अल्लाह के सब ही नाम अच्छे हैं, उन नामों से उसको पुकारो) में आया है, इस निन्यानवें नामों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि इनके अतिरिक्त और नाम क़ुरआन व हदीस में आए हैं, उनके साथ दुआ करनी चाहिए, लेकिन अपनी ओर से कोई ऐसा नाम जो क़ुरआन व हदीस में नहीं आया है, नाम के तौर पर नहीं ले सकते यद्यपि उसका अर्थ ठीक भी हो।
अस्मा-ए-हुस्ना पढ़ने का तरीका-

हमने क्रमशः नाम और उनकी विशेषताएँ दी हैं। जब इन 'अस्मा-ए-हुस्ना' को पढ़ना चाहें तो इस प्रकार शुरू करें-

हुवल्ला हुल्‌ लज़ी ला इला-ह-इल्ला हुवर- ऱहमान-उर्‌-ऱहीम' अंत तक पढ़ते जाइए। हर नाम को दूसरे नाम के साथ मिला दें। जिस नाम पर साँस लेने के लिए रुकें उसको न मिलाए, और बगैर 'उ' के पढ़ें तथा अगला नाम 'अल्‌' से शुरू करें। उदाहरण के लिए 'अल्‌-अज़ीज़ो' पर साँस लेने के लिए रुकें तो उसको 'उल्‌-अज़ीज़' पढ़ना चाहिए और अगले नाम को 'अल-जब्बारो' पढ़ें।
जब किसी खास (विशेष) नाम का वज़ीफ़ा पढ़ें तो 'अल्‌' की जगह 'या' पढ़ें। उदाहरण के लिए यदि 'अर्‌-ऱहमान' का वज़ीफ़ा पढ़ना हो तो 'या ऱहमान' पढ़ें-

पढ़ने के आदाब-

जिस जगह पढ़ें, वह जगह पाक व साफ होनी चाहिए।
पढ़ने वाले का मुँह और जबान पाक व साफ होनी चाहिए।
पढ़ते वक्त मुँह क़िबले की ओर होना चाहिए। विनम्र, विनीत, सकून और निश्चिन्त होकर पूरे ध्यान के साथ पढ़ें।
तादाद की अधिकता के कारण जल्दी न करें।
जिस व्यक्ति का कोई वज़ीफ़ा रात या दिन या किसी विशेष समय पर निश्चित हो और उसे पाबंदी से पढ़ता हो, यदि किसी दिन छूट जाए, तो उसको जिस समय भी संभव हो, पढ़ लेना चाहिए। उस दिन बिल्कुल ही न छोड़ देना चाहिए।

किसी नाम का 'इस्मे-आज़म' निकालने का तरीका
किसी भी व्यक्ति के नाम का 'इस्म-ए-आज़म' निकालने के लिए उस नाम को अरबी लिपि में लिखें और इस अध्याय के अंत में दी गई 'आदाद तालिका' (अंक तालिका) की सहायता से उस नाम के अंक (आदाद) जोड़कर बना लें। फिर उतने अंक (आदाद) का एक नाम 'अस्मा-ए-हु़स्ना' में से तलाश करें। हमने 'अस्मा-ए-ह़ुस्ना' में हर नाम के आगे उस नाम के अंक दिए हैं। यदि अपने नाम के अंक का कोई नाम 'अस्मा-ए-ह़ुस्ना' में न मिले तो दो या तीन नाम मिलाकर एक नाम बना लें।
जैसे एक नाम के अंक 156 हैं और इन अंकों का कोई नाम 'अस्मा-ए-ह़ुस्ना' में नहीं है तो ऐसे दो नाम तलाश कीजिए जिनका योग 156 हो 'अल-वली' (46) तथा 'अल-अली' (110)। इस प्रकार इस नाम का 'इस्म-ए-आज़म' या 'वली या अली' हुआ। इसके अंकों को दोगुना अर्थात्‌ 312 बार पढ़ें तो यह उस व्यक्ति के लिए 'इस्म-ए-आज़म' का काम करेगा। और याद रखो- अल्लाह की याद से दिल आराम पाते हैं।



और भी पढ़ें :