परछाई से लगाएँगे ओसामा का पता!

नासा की नई खोज

भाषा|
-वेबदुनियडेस्
अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के लिए अमेरिका ने क्या-क्या नहीं किया। अपनी पूरी सैन्य ताकत झोंक दी, लेकिन आज तक तो सफलता हाथ नहीं लगी। अब नासा ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है।

उसके वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्होंने ऐसा सॉफ्‍टवेयर तैयार किया है, जिसकी मदद से सैटेलाइट या जासूसी विमान के माध्यम से ली गई किसी भी शख्स की परछाई की तस्वीरों से उसकी पहचान की जा सकती है। कहा जा रहा है कि ओसामा को पकड़ने में भी इसी तकनीक का उपयोग किया जाएगा।
क्या है तकनीक : इस तकनीक की खोज में अहम भूमिका निभाने वाले नासा की जेट प्रोपल्सन लैबोरेटरी, कैलिफोर्निया के वैज्ञानिक डॉ. एड्रीन स्टोइका ने इसे गैट एनालिसिस (चाल-ढाल का विश्लेषण) नाम दिया है। असल में सैटेलाइट या जासूसी विमानों से दुनिया के किसी भी हिस्से में चहलकदमी कर रहे शख्स पर नजर रखी जा सकती है। यही नहीं, उच्च तकनीक वाले कैमरों से तस्वीरें उतारी जा सकती हैं और वीडियो बनाए जा सकते हैं।
नए सॉफ्टवेयर के जरिये किसी भी शख्स की परछाई की तस्वीरों या वीडियो को कम्प्यूटर में फीड कर उसकी पहचान का पता लगाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए उस शख्स की चाल-ढाल के बारे में अहम जानकारी पहले से लोड होना जरूरी है। सॉफ्टवेयर पहले से उपलब्ध जानकारी और सैलेटाइट से प्राप्त तस्वीर या वीडियो का मिलान कर बता देगा कि वह शख्स कौन है। डॉ. स्टोइका ने एडिनबर्ग में सुरक्षा की दृष्टि से इसके महत्व के बारे में बताया।
वैज्ञानिकों का तर्क : वैज्ञानिकों का कहना है कि इनसान ऊपर से कितने ही रूप बदल ले, लेकिन उसकी चाल नहीं बदलती है। असल में जब कोई व्यक्ति चलता है, तो उसके कदमों की लंबाई एक समान होती है, उसके चलने की गति एक जैसी रहती है, यही नहीं उसके घुटनों, कूल्हों और एड़ी का हिलना भी एक समान होता है।

उदाहरण के लिए मान लिया जाए कि ओसामा की चाल-ढाल के बारे में पूरा विवरण मौजूद है। अब सैटेलाइट के अफगानिस्तान या दुनिया के किसी भी कोने में चहल-कदमी कर रहे व्यक्ति की परछाई की हलचल इस विवरण से मिलती है, तो माना जा सकता है कि वह व्यक्ति लादेन होना चाहिए।
सफल प्रयोग : इस बारे में वैज्ञानिक सफल प्रयोग कर चुके हैं। एक बहुमंजिला इमारत की छठी मंजिल से सड़क पर चहल-कदमी कर रहे व्यक्ति की परछाई का वीडियो बनाया गया। कम्प्यूटर में उसकी चाल-ढाल के बारे में पहले से ब्योरा फीड था। बाद में जब वीडियो और उपलब्ध जानकारी का मिलान किया गया, तो सिस्टम ने बता दिया कि नीचे चल रहा वह व्यक्ति कौन है।
यह योजना भले ही अपने आरंभिक चरण में हो, लेकिन इससे भविष्य के लिए बड़ी उम्मीदें जगती हैं। माना जा रहा है कि यदि यह व्यवस्था पूरी तरह से सफल रहती है, तो इससे दुनियाभर के खतरनाक आतंकियों और अवांछित तत्वों पर नजर रखी जा सकती है। आने वाले समय में सेना, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के लिए यह काफी अहम साबित हो सकती है।

उठते सवाल : कुछ लोगों ने इसकी सफलता पर सवाल उठाए हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह साफ्टवेयर सूर्य के अस्त होने के बाद किसी काम का नहीं रहेगा। इसके अलावा सैटेलाइट से धरती पर नजर डालने पर हर व्यक्ति का सिर ही दिखाई देता है। उसकी परछाई तक पहुँचना काफी मुश्किल होगा।
लंदन के किंग्स कॉलेज में सैटेलाइट इमेजरी के विशेषज्ञ डॉ. भूपेंद्र जसानी का कहना है कि सैटेलाइट या आसमान में काफी ऊँचाई पर उड़ान भर रहे विमान से ली गई तस्वीरों की गुणवत्ता इस स्तर की नहीं होती है कि उनसे परछाई देख किसी को पहचाना जा सके। उन्होंने माना कि बेहतर तकनीक के बाद भी इस सिलसिले में उपयोगी कही जाने वाली तस्वीरें हासिल करना मुश्किल होगा।
पाक-ईरान में सफल : वैज्ञानिकों के मुताबित यह तकनीक पाकिस्तान और ईरान जैसे देशों में सफल हो सकती है, जहाँ अधिकांश समय मौसम शुष्क रहता है और परछाई पकड़ पाना आसान होता है, लेकिन मैनचेस्टर जैसे शहरों में ज्यादातर समय मौसम खराब रहता है। वहाँ बारिश के समय ऐसा करना संभव नहीं होगा।

बहरहाल, इस तकनीक का भविष्य तो जल्द ही पता चल जाएगा, लेकिन आकाश से खुफियागीरी का सिलसिला काफी पुराना है। 19वीं सदी से ऐसा किया जा रहा है। शुरुआत में आकाशीय बेलून दुश्मन देश में भेजे जाते थे, ताकि पता लगाया जा सके कि उसकी जमीन पर क्या तैयारियाँ चल रही हैं। हाल ही के वर्षों में तकनीक के साथ इसमें काफी सुधार आया है।



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