मत भूलो कि आप भगवान के आश्रय में हैं

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बालक पैदा होते ही नहीं रोता है तो उसके लिए डॉक्टर सोचते हैं कि या तो कोई विशिष्ट होगा या तो पागल होगा। बालक को रोना ही चाहिए। इसीलिए मां कौशल्या ने राम को रुलाया। मनुष्य जीवन का कहता है कि रो..रो..रो..।


कबीरा हंसना छोड़ दे रोने से कर प्रीत।
बिनु रोये कित पाइये प्रेम प्यारे मीत।

तो भरतजी को, श्री उद्धवजी को देखो। नन्दबाबा को देखो। जिन-जिन लोगों ने भक्ति की है, वो कभी रोए हैं। ज्ञान में निरुपाधिस्थिति, कर्म में उपाधिस्थिति, योग में समाधिस्थिति और भक्ति में व्याधिस्थिति होती है। वैसे कुछ फर्क है भी नहीं, और कुछ फर्क है भी।

बहनें पुरुष से ज्यादा भक्ति कर सकती हैं। केवल शरीर के माध्यम से देखो तो भी। क्योंकि बहनें ज्यादा रो सकती है, पुरुष ज्यादा नहीं रो सकता। तो ज्ञान और भक्ति का ये अंतर थोड़ा सा आप समझें। दूसरी बात ज्ञान तो कठिन ही है।

ज्ञान कठिन है। भक्ति कठिन भी है, और सरल भी है। ये एक और ज्ञान भक्ति में अंतर है। ज्ञान तो सर्वकाल, सभी युग में, सर्वदेश में कठिन ही है। रामजी ने भी कहा कि ज्ञान में कई प्रत्यूह हैं। ज्ञान का साधन कठिन है। और मन में स्थिर करके, बहुत पुरुषार्थ करके कठिन मार्ग से भक्ति पाना है तो वो वहीं से ही जाएं।
जो यह नहीं कर सकता, जो असमर्थ है, वो सरलता से भी भक्ति प्राप्त कर सकता है।




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