गालिब याद आते हैं...

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गालिब के जन्म दिन 27 दिसम्बर पर विशेष ..

हुई मुद्दत कि गालिब मर गया, पर याद आता है
वह हर इक बात पर कहना कि यों होता तो क्या होता

उर्दू के महान शायर की गिनती दुनिया के उन चंद साहित्यकारों में होती है जिन्होंने किसी भाषा के विकास की दशा और दिशा बदल दी और उस पर अपनी अमिट शाप छोड़ी। उर्दू के इतिहास में गालिब की अलग पहचान है उनसे पहले उर्दू मुख्य रूप से महज हसीनाओं के रंग रूप नयन नक्श और उनकी जुल्फों से खेलने वाली भाषा थी लेकिन गालिब के बाद से उसमें सूफियाना तत्व आया और लोगों ने जाना कि इसमें गंभीर विषयों में लिखा जा सकता है। गालिब के लेखन में रहानियत, जिन्दगी की आपाधापी, रोजमर्रा की गठिनाइयाँ, आपबीती, समय और समाज की विसंगतियाँ शामिल हैं। उनका एक शेर है-
दरो दीवार पर उग रहा सब्ज गालिब
हम बयाबां में हैं और घर में बहार आयी है।

गालिब एक बड़े शायर थे। इकबाल ने उन्हें जर्मनी के गेटे के समकक्ष माना है। गालिब का जन्म आगरा में 27 दिसंबर 1797 में हुआ। उनके दादा इससे लगभग पचास साल पहले समरकंद से आए थे। गालिब का स्वभाव ईरानी, धार्मिक विश्वास अरबी, शिक्षा दीक्षा और संस्कार हिन्दुस्तानी और भाषा उर्दू थी। वह बचपन से शेर कहने लगे थे और उन्होंने पच्चीस वर्ष की आयु से पहले ही अपने कुछ बेहतरीन कसीदे और गजलें लिख दी थीं 1 तीस. बत्तीस वर्ष का होते होते उन्होंने उर्दू की दुनिया में हलचल मचा दी थी। वह फारसी भाषा और साहित्य पर भी गहरी नजर रखते थे। अनुभवों के धनी गालिब स्वयं लिखते हैं कि सत्तर वर्ष की उम्र में सत्तर हजार से अधिक लोग आँखों के सामने से गुजर चुके हैं। मैं इंसान नहीं इंसानों का पारखी हूँ।
गालिब एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक थे इस लिये अपने समय के सभी प्रमुख लोगों से उनका मेलजोल था। उनके व्यक्तित्व और स्वभाव का चित्रण करते हुए अली सरदार जाफरी ने कहा है-'बादशाहों और धनवानों से लेकर शराब विक्रेताओं तक और दिल्ली के पंडितों और विद्वानों से लेकर अँग्रेज अधिकारियों तक असंख्य व्यक्ति गालिब के निजी दोस्तों में शामिल रहे। उन्होंने जवानी की रंगरेलियों का जिक्र अनेक बार स्वयं किया। नृत्य, संगीत, मदिरा, सौंदर्योपासना, जुआ किसी भी चीज को कभी मना नहीं किया। बीस पच्चीस वर्ष की आयु में भी जब रंगरेलियों से दिल हट गया तो सूफियों जैसा स्वतंत्र व्यवहार अपनाया। नमाज पढ़ी नहीं, रोजा रखा, शराब छोड़ी नहीं, स्वयं को हमेशा गुनाहगार कहा लेकिन खुदा, रसूल और इस्लाम पर पूरा विश्वास किया।'
गालिब कहते हैं ..
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता, तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता

गालिब को चंद चीजों का शौक हवस की हद तक था विद्या और प्रतिष्ठा की लालसा तीव्र तृष्णा बनकर जीवन भर साथ रही। अपनी पहचान स्थापित करने की हरदम कोशिश रहती। उन्होंने लिखा है..
पूछते हैं वह कि गालिब कौन है
कोई बतलाओ, कि हम बतलाएँ क्या

कड़वे करेले, इमली के खट्टे फूल, चने की दाल, अंगूर, आम, कबाब, शराब, मधुर राग और सुंदर मुखड़े हमेशा गालिब को ललचाते रहे। जाफरी लिखते हैं-'यूँ तो गालिब जीवन भर इन चीजों के लिए तरसाते रहे लेकिन यदि चंद चीजें कभी एक साथ जमा हो गयी तो उस वक्त उनका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच गया और उन्होंने स्वयं को त्रिलोक का सम्राट समझ लिया।.. इसलिए गालिब जब कभी भी किसी मुकाम में सफल हुए तो अपने विरोधियों को दुतकारने में कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने लिखा ...
थी खबर गर्म कि गालिब के उड़ेंगे पुर्ज
देखने हम भी गए थे लेकिन तमाशा न हुआ

गालिब गजल कहने या न कहने के मायने बेहतर जानते थे इसलिये कहते हैं ...
कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं
आज गालिब गजलसरा न हुआ

गालिब का पूरा जीवन संघर्ष में बीता। रहन-सहन का शाही अंदाज और हर समय उसी अंदाज में बने रहने की जिद ने कई बेहतरीन मौके उनके हाथ से गवाँ दिए। गजल और चापलूस लोगों से घिरे रहने के कारण उन्होंने अनेक लोगों को बेमतलब दुश्मन बना लिए। वह अपनी गलती स्वयं स्वीकार करते हैं और अपनी सफाई भी देते हैं .. दिल दिया जान के क्यों उसका बफादार
असद गलती की जो काफिर को मुसलमां समझा

और एक जगह वह कहते हैं ..
हम कहाँ के दाना थे किस हुनर के यकता थे
बेसबब हुआ गालिब दुश्मन आरमां अपना

बचपन में ही अनाथ हो जाना, दिल्ली का निवास और कोलकाता की यात्रा गालिब के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। उनका लड़कपन आगरे में बीता, वहीं शायरी की शुरुआत में बेहद अनगढ़ और बेतरतीब शेर कहे जिन पर तत्कालीन शायरों ने तीखी आलोचना की जिन्हें गालिब ने अपनी जिद के कारण हँसी में उड़ा दिया। चाचा की मृत्यु के बाद उन्होंने आगरा छोड़ दिया और दिल्ली आ गये लेकिन उनके आने से पहले उनकी शायरी के चर्चे यहाँ पहुँच चुके थे। दिल्ली आ कर प्रसिद्ध साहित्यकारों की राय की गालिब उपेक्षा नहीं कर सके। इससे उनकी शायरी में निखार आया।



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