बरगद की घनी छाँव के तले

चलते-फिरते बरगद में बसते गाँव

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क्या पेड़ भी चलते हैं? ... घूमते-फिरते हैं? ... बाग में चहलकदमी करते हैं? आपको शायद विश्वास न हो मगर कुछ पेड़ ऐसा करते हैं! बरगद के पेड़ को कई बार चलने वाले पेड़ भी कहा जाता है। कारण यह कि इसकी जटाएँ जमीन तक पहुँचकर जब मिट्टी में जड़ पकड़ लेती हैं तो अतिरिक्त तनों का रूप ले लेती हैं। इस तरह पेड़ नए-नए अतिरिक्त तने पाकर अपना घेरा बढ़ाता चलता है।

नए तनों से बढ़ते इसके कदमों के कारण इसे 'कई पैरों वाला पेड़' भी कहा जाता है। कभी-कभी मूल तना खोखला होकर समाप्त हो जाता है और नए तनों में से कोई मुख्य तने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा लेता है। इस प्रकार पेड़ का केंद्रबिंदु ही स्थानांतरित हो जाता है। हुआ न 'चलने वाला पेड़?' बताते हैं कि गुजरात में एक बरगद ऐसा भी है जिसने इस प्रकार पिछले 200 साल में दो मील की दूरी तय की है!

यह तो हुई बरगद की बात लेकिन गुजरात में ही एक भी घुमक्कड़ निकला है। स्थानीय लोग इसे 'चालतो आम्बो' कहते हैं। संजान नामक छोटे-से कस्बे में स्थित इस पेड़ के बारे में कहा जाता है कि इसे आज से लगभग हजार-सवा हजार साल पहले ईरान से आए शरणार्थियों ने रोपा था, जिनके वंशज पारसी कहलाते हैं। इसका बीज वे अपनी जन्मभूमि से लेकर आए थे। माना जाता है कि इस दौरान इस पेड़ ने कोई चार किलोमीटर का सफर तय किया है। इसके आगे बढ़ने का तरीका भी वही है, जो बरगद अपनाता है।

बरगद की छाँव के तले
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पेड़ों के साथ ऐसी कई दिलचस्प कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। बड़ा रोचक और तिलस्मी होता है पेड़ों का संसार। अब बरगद को ही लें। कुछ विशाल बरगद इतना व्यापक घेरा बना लेते हैं कि एक ही पेड़ किसी जंगल-सा आभास देता है। कहा जाता है कि भारत पर आक्रमण करने आए सिकंदर की सात हजार सैनिकों वाली सेना को जब एक बार घनघोर बारिश से बचने की जरूरत पड़ी, तो पूरी की पूरी सेना ने एक बरगद के नीचे शरण ली। उन विदेशी सैनिकों को यह जानकर घोर आश्चर्य हुआ कि वे जहाँ खड़े हैं, वह कोई जंगल नहीं बल्कि एक ही पेड़ का घेरा है! आज श्रीलंका में मौजूद एक विशाल बरगद के 350 बड़े और 3000 छोटे तने हैं तथा यह अब भी अपना घेरा बढ़ाता जा रहा है।

निरंतर अपना घेरा बढ़ाने के कारण ही बरगद को अमरत्व, दीर्घायु, अनंत जीवन के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। एक अलग दृष्टिकोण से देखें, तो इसे विस्तारवादी मानसिकता का भी प्रतीक कहा जा सकता है! अँगरेज कवि एडवर्ड थॉम्पसन ने बरगद की तुलना नित नई जमीन हड़पकर अपना साम्राज्य निरंतर फैलाने वाले राजा से की है, जिसकी अपने राजमहल में नए-नए कक्ष और स्तंभ स्थापित करने की भूख खत्म होने का नाम ही नहीं लेती! तो बरगद को मृत्युंजयी मानकर पूजें या साम्राज्यवादी मानकर झिड़की दें, यह तो देखने वाले और उसके नजरिए पर निर्भर करता है।

जो भी हो, बरगद यह संदेश तो देता ही है कि जीवन सदा चलायमान है, परिवर्तनशील है। जड़ें जमाने का अर्थ जड़वत होना नहीं है। यह भी कि मिट्टी से गहरे जुड़े रहकर जो अपना विस्तार करता है, वही सबसे स्थिर और शक्तिशाली होता है। जरा बरगद को अच्छी तरह देखिए, क्या आसन जमाए बैठे किसी धीर-गंभीर ज्ञानी बुजुर्ग का आभास नहीं देता बरगद? ऐसा, कि जिसके कदमों में बैठने मात्र से शांति का आभास हो, कुछ नया सीखने को मिले।

बरगद की छाँव के तले
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बरगद अपनी छाँव में एक भरा-पूरा मोहल्ला या कहें गाँव बसाता है। इस पर विभिन्न तरह के पंछियों के अलावा साँप, चूहे, बंदर, चमगादड़, कीड़े-मकोड़े और न जाने कौन-कौन-से जीव साधिकार अपना घर बसा लेते हैं। इतनी लंबी-चौड़ी शीतल छाँव का लोभ मनुष्य भी कैसे त्याग सकता है? बच्चों के लिए तो इसकी जटाएँ 'टारजन' बनने की प्रैक्टिस करने के लिए आदर्श सुविधा प्रदान करती हैं!

इसके अलावा इसकी छाँव में चौपालें जमती हैं, दोपहर की झपकी ली जाती है, ठेले-खोमचे सजते हैं। संभावना जताई जाती है कि बरगद के नीचे दुकान सजाने वाले 'बनियों' को देखकर ही सदियों पहले भारत आए योरपीय लोगों ने इस पेड़ का अँगरेजी नामकरण 'बैनियन' किया। ठेले-खोमचे तो छोड़िए, क्या आप जानते हैं कि देश का सबसे पुराना शेयर बाजार यानी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज भी बरगद की छाँव में ही शुरू हुआ था? 1851 में मुंबई के शेयर दलाल एक बरगद के नीचे शेयरों का कारोबार करने लगे। जब सड़क बनाने के लिए वह बरगद काट दिया गया, तो वे एक अन्य बरगद के नीचे अपना काम करने लगे। मुंबई के तेजी से होते 'कांक्रीटीकरण' के कारण उन्हें जल्द ही इस बरगद की छाँव से भी वंचित होना पड़ा। तब जाकर उन्होंने 1874 में दलाल स्ट्रीट में अपना भवन स्थापित किया, जो आधुनिक रूप में आज भी खड़ा है।

इंडोनेशिया में बरगद को साम्राज्य का बड़ा-बुजुर्ग माना जाता है। इन्हें बड़ी श्रद्धा से देखा जाता है। रास्ते में कोई बरगद दिख जाए तो वाहन सवार उसका अभिवादन करने के लिए हॉर्न बजाकर निकलते हैं! मानो ओटले पर बैठे किसी बुजुर्ग से आप कह रहे हों,'दद्दू राम-राम'। चीन में तो करीब हजार साल पहले फुझू नामक शहर के महापौर को बरगद इतना रास आ गया कि उन्होंने नागरिकों को फरमान जारी कर दिया कि वे हर कहीं बरगद बोएँ!

होशंग घ्यारा
नतीजा यह कि शहर का नाम बरगदों वाला शहर पड़ गया। इधर एक भारतीय बरगद ने कुछ ज्यादा ही लंबा सफर तय किया है। 1873 में यह अमेरिका के हवाई द्वीप जा पहुँचा। नहीं, अपनी जटाओं/तनों के बल पर चलकर नहीं, जहाज में सवार होकर। तब यह आठ फुट ऊँचा था और इसका एक ही तना था। आज यह 50 फुट से ज्यादा कद प्राप्त कर चुका है और इसके 12 तने हैं। जाहिर है, लंबे सफर के बाद अमेरिका की आबोहवा इसे रास आ गई है।


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