पुस्तक मेले में पौराणिक कथाओं पर परिचर्चा

विश्व पुस्तक मेला 2014

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कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध पत्रकार वर्तिका नंदा ने किया। इस परिचर्चा में नरेन्द्र कोहली और आनंद नीलकंठन ने महाकाव्यों के घटनाक्रमों और पात्रों पर अपने-अपने विचार रखे।

परिचर्चा के दौरान नरेन्द्र कोहली ने अपने चिरपरिचित अंदाज में अपनी पुस्तकों और मूल ग्रंथों के माध्यम से यह समझाया कि नायक, नायक क्यों हैं। वहीं आनंद नीलकंठन ने अपने अनुभव के आधार पर यह समझाने का प्रयास किया कि मूल महाकाव्यों में रावण और दुर्योधन के चरित्र वैसे नहीं थे, जैसे आज दिखाई पड़ते हैं। समय के साथ विभिन्न कहानियां इनमें जुड़ती गई इस वजह से कई विरोधाभास पैदा हुए हैं।

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विश्व पुस्तक मेले में वाणी प्रकाशन और नेशनल बुक ट्रस्ट के सौजन्य से आयोजित ‘हिन्दी महोत्सव’ में ‘पौराणिक कथाओं पर परिचर्चा’ सत्र का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वाणी प्रकाशन से प्रकाशित संकलन के वरिष्ठ कथाकार नरेन्द्र कोहली और ‘असुर’ और ‘अजय’ किताब के लेखक मौजूद रहे।
आनंद नीलकंठन ने कहा कि उनके अनुसार कोई भी पूरी तरह से सही या गलत नहीं है, सबमें सभी गुण विद्यमान हैं। नरेन्द्र कोहली ने कई उदाहरणों के माध्यम से कहा कि आम पाठक स्वभाव से ऐसा है कि उसे एक नायक और खलनायक रुपी पात्र चाहिए ही ताकि वह भेद कर सके। नायक एक आदर्श व्यक्ति ही होना चाहिए।



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