बचपन के इक बाबूजी थे

27 नवंबर हरिवंशराय बच्चनजी की जन्म शताब्दी पर विशेष

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अमित बोले- 'बाबूजी के मन में एक खास तरह का आक्रोश था। रीति-रिवाज, जाति-पाँति इन सबसे परे थे बाबूजी। पर सारी दुनिया को वे वैसी राह चलने को मजबूर करें ऐसा नहीं सोचते थे। उनकी विचारधारा बड़ी डेमोक्रेटिक और फ्री और लिबरल थी।'

1942 के एक कंजर्वेटिव इलाहाबाद शहर में लाहौर जैसे आधुनिक शहर की एक सरदारनी को ब्याह कर ले आए। लेकिन सारा इलाहाबाद शहर ऐसा करे, ऐसा कभी नहीं कहा उन्होंने। न ही कभी उन्होंने इस बात का विरोध किया कि माँ हमें गुरुवाणी का पाठ पढ़कर क्यों सुनाती हैं। न ही कभी इस बात का विरोध कि उनका एक पुत्र बंगाली से शादी कर रहा है, दूसरा सिंधी से। यदि वे जीवित होते तो अपने पोते का ब्याह एक दक्षिण भारतीय से होते देख अत्यंत खुश होते।

मैंने कहा- हाँ सच बात है। वे अपनी विचारधारा को उपदेश के रूप में कभी नहीं पिलाते थे। वरन बस चुपचाप खुद करके दिखा देते थे।

अमित थोड़े गंभीर होकर बोले- 'देखिए, बाबूजी बोलते कम थे। उनके कर्म बोलते थे। यह हम पर है कि हम उन कर्मों से कितना समझते-सीखते हैं। मन की व्यथा, पीड़ा, कष्ट, दुविधा सब कुछ व्यक्त करने के लिए जब ईश्वर ने हमें कोई माध्यम, कोई गुण दिया है तो उसमें विलीन होकर, अपनी अंतरात्मा को संभालकर हमें रखना ही चाहिए।
मेरे सामने तो कैमरा आया कि मेरी क्रिएटिविटी जागृत होकर मेरी हर पीड़ा का इलाज स्वयं खोज लेती है। कुछ लोग ऐसा नहीं भी कर पाते। पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए वे अलग माध्यम खोजते हैं। नशा उनमें सबसे प्रबल होता है। शराब का, सिगरेट का, ड्रग्स का... ऐसे मनुष्य कमजोर होते हैं। मेरा यह मानना है कि यह जो क्रिएटिविटी नाम की चीज होती है न, यह केवल कलाकारों या साहित्यकारों के पास ही नहीं होती। यह तो मनुष्य मात्र के अंदर समाई हुई है। ईश्वर की यह सबसे बड़ी देन है। उसे पहचानना और पहचानकर निखारना यह मनुष्य का काम है। उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है।'
सभी जानते हैं कि तुमने स्वयं को बहुत संयमित रखा हुआ है। तुम्हारे साथ काम करने वाले हर छोटे-बड़े कलाकार तुम्हारे समय की पाबंदी, काम के प्रति प्रतिबद्धता और अनुशासन से बेहद प्रभावित होते हैं- इतना संयम कैसे उपलब्ध किया?

'अब मैंने उपलब्ध किया या हो गया, यह मैं नहीं जानता पर यह बात सच है कि दिए हुए समय पर पहुँच जाना मुझे अच्छा लगता है। मेरी माँ और बाबूजी दोनों ही अनुशासनप्रिय थे, फिर में पं. जवाहरलाल नेहरूजी और इंदु आंटी से भी इस तरह की शिक्षा पाते रहते थे- बचपन की मुझे याद है कि चाहे खेल बीच में छोड़ना पड़े चाहे बेहद तेज साइकल चलानी पड़े, मगर सड़क का लैम्पपोस्ट जलने के पहले घर पहुँचना एकदम अटल नियम था। कई बार डाँट-मार भी पड़ी।
पर एक बात थी कि बाबूजी चाहे खुद चपत टिका दें, पर कोई दूसरा हम पर हाथ उठाए, यह उन्हें कतई गवारा नहीं था। एक बार तो मेरे प्रिंसीपल को भी फटकार आए थे- ऐसी बातों से बड़ा आत्मबल मिलता था। परिवार का साथ और सहयोग इससे बढ़कर शक्ति विश्व में कोई नहीं। परिवार साथ में हो तो दुनिया की सारी ताकतें कमजोर पड़ जाती हैं। जीवन की ऐसीसारी सचाइयों से बाबूजी ने खूब अवगत कराया था।



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