श्याम बेनेगल का मयूरपंखी फिल्म-सफर

Mandi
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आरोहण के बाद बेनेगल ने सर्वथा भिन्न विषय पर अपनी विवादास्पद फिल्म 'मंडी' का निर्माण किया। बेनेगल के अनुसार वे एक व्यंग्यात्मक फिल्म बनाना चाहते थे, जो समाज के दोहरे मानदंडों पर प्रहार करती हो। छोटे से कस्बे पुरंतनपल्ली की आरामतलब प्राचीन बसाहट का स्थान तिकड़मी व्यापारी व्यवस्था लेना चाहती है।

इस उजड़ते माहौल की चपेट में रुक्मणीबाई (शबाना आजमी) का कोठा भी आता है, जहाँ कई वेश्याएँ कभी ग्राहकों, तो कभी पुलिस के अत्याचार का सबब बनती हैं। दीन दुनिया से यह अलग अनूठी देह की मंडी है, जहाँ आत्मा भी खरीदी जा सकती है। शबाना, स्मिता पाटिल, ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा जैसे कला सिनेमा के सभी प्रमुख कलाकार इस फिल्म में मौजूद थे। इसे श्रेष्ठ कला निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।

गोआ में एक मित्र के जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुँच चुके पैतृक घर का अवलोकन करते हुए श्याम को अनुभव हुआ कि वर्तमान में अतीत किस कदर गहरे दबा हुआ है। उन्होंने इसी विषय को अपनी फिल्म त्रिकाल (1984) में रेखांकित किया। इसकी पटकथा भी उन्होंने ही लिखी।

त्रिकाल गोआ के मुक्ति संघर्ष और पुर्तगाली आधिपत्य की पृष्ठभूमि में फिल्माया गया एक सिनेमाई दस्तावेज था, जिसमें भूत, भविष्य और वर्तमान की सामयिक प्रश्नों को उठाने की चेष्टा की गई। इस प्रयोगवादी फिल्म में लीला नायडू, नसीरुद्दीन शाह, नीता गुप्ता ने प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर चुका रूज परेरा अपने पैतृक स्थान गोआ लौटकर चकित रह जाता है कि किस तरह समय ने करवट ली है। अतीत के स्मरण की प्रक्रिया में वह कई ‍िदलचस्प परिस्थितियों से गुजरता है।

त्रिकाल सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित की गई। इसे लिस्बन तथा लंदन फिल्म समारोह में भी प्रदर्शित किया गया। वृद्धा मारिया सोरेस की भूमिका में अभिनेत्री लीला नायडू का अभिनय फिल्म का मुख्य आकर्षण था।

यदि 'मंथन' में श्याम ने दुग्ध उत्पादकों के जीवन संघर्ष की दास्तान बयान की, तो 'सुस्मन' (1986) में वे बुनकरों का दुःख-दर्द लेकर आए। आंध्रप्रदेश के पोचमपल्ली गाँव के बुनकर परिवार का रामुलु (ओमपुरी) अपने भाई लक्षम्या के साथ जीवन-यापन कर रहा है। पॉवरलूम के आने और हथकरघा उद्योग में सहकारिता व्यवस्था के भ्रष्ट स्वरूप के बीच रामुलु खुद को असहाय महसूस करता है। अंततः उसके हुनर की जीत होती है और उसकी कृतियों की प्रदर्शनी पेरिस में लगाई जाती है।

फिल्म के वृत्तांत निरूपण हेतु संत कबीर की वाणी का वाचन पृष्ठभूमि में किया गया है, जो 16वीं सदी के जुलाहे संत थे। इस फिल्म के लिए अभिनेता ओमपुरी ने खुद कपड़ा बुनना सीखा। उन्होंने हाथ से एक साड़ी बुनकर श्याम की पत्नी की भेंट की थी।

अंतर्ना
श्याम की कमोबेश हर फिल्म किसी न किसी सामाजिक घटनाक्रम से प्रेरित रही। 'मंथन' में यदि उन्होंने दुग्ध सहकारिता के फायदे गिनाए तो 'सुस्मन' में सहकारिता के विकृत होते स्वरूप पर प्रश्नचिह्न भी खड़े किए। इससे स्पष्ट है कि एक उम्दा रचनाकार निरंतर अपनी विचारधारा को बाधित नहीं होने देता।

ND|
प्रतिभा का आरोह1982 में प्रदर्शित बेनेगल की फिल्म 'आरोहण' 1967 से 1977 के कालखंड की पृष्ठभूमि में दिहाड़ी पर फसल काटने वाले निर्धन श्रमिक हरि मंडल की कहानी है, जो अपनी बंधुआ मजदूर जैसी हालत से तंग आकर सामंती व्यवस्था के विरुद्ध राजनीति, सामाजिक चेतना से भर उठता है। भूमि सुधार कानून और उसकी उपादेयता के प्रश्न को टटोलने वाली यह फिल्म सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म के राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित की गई। इसे कार्लोवी वेरी फिल्मोत्सव में भी पुरस्कार मिला। फिल्म में अभिनेता ओमपुरी का अभिनय लाजवाब था।
1991 में निर्मित अपनी फिल्म 'अंतर्नाद' में बेनेगल ने ग्रामीण स्वाध्याय आंदोलन की सचाई जानने की कोशिश की। 1950 के दशक में पंडित पांडुरंग शास्त्री आठवले ने भक्ति और स्वाध्याय के जरिए समाज के समग्र विकास की अलख जगाई थी। 15 हजार गाँवों के अनेक ग्रामीणों ने इस प्रथा को अपनाया और सामाजिक क्रांति का उद्घोष किया। शबाना आजमी, के. रैना, कुलभूषण खरबंदा जैसे कलाकारों ने 'अंतर्नाद' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अस्पृश्यता उन्मूलन, साक्षरता जैसे कई मुद्दों का विश्लेषण करने वाली यह फिल्म ज्यादा चर्चित नहीं हुई, पर इसे समीक्षकों ने सराहा।


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