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Written By अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

विचारों से दूर होते रोग

योगा विचार
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दुनिया का ऐसा कोई रोग नहीं जिसे समय रहते योग के माध्यम से दूर नहीं किया जा सकता। शर्त सिर्फ इतनी सी है कि मन में दृढ़ संकल्प की भावना होना चाहिए। मन में दृढ़ संकल्प की भावना भी योग के माध्यम से ही आती है। योग त्रिस्तर पर व्यक्ति का सुधार करता है शरीर, प्राण और मन अर्थात आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार से धारणा ‍की सिद्धि।

वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि रोग की शुरुआत हमारे मन से होती है। मन में विचारों का झांझावत चलता रहता है। इन असंख्‍य विचारों में से ज्यादातर विचार निगेटिव ही होते हैं, क्योंकि निगेटिव विचारों को लाना नहीं पड़ता वह स्वत: ही आ जाते हैं। सकारात्मक विचार के लिए प्रयास करना होता है। सवाल यह उठता है कि कैसे विचारों से दूर होंगे रोग?

सोचने का योगा स्टाइल: मैं आज मन में नकारात्मक विचार 'नहीं' आने दूँगा।- यह निगेटिव सेन्टेंस् है। योग इस तरह के सेन्टेंस का विरोध करता है। योगा स्टाइल यह है- 'मैं आज मन में 10 सकारात्मक विचार लाऊँगा।' 'नहीं' शब्द को अपने मन-मस्तिष्क से रफादफा कर दो।

म-नियम : यम के पाँच प्रकार हैं- (1)अहिंसा, (2)सत्य, (3)अस्तेय, (4)ब्रह्मचर्य और (5)अपरिग्रह। नियम के भी पाँच प्रकार होते हैं- (1)शौच (2)संतोष (3)तप (4)स्वाध्याय और (5)ईश्वर प्राणिधान। विचारों के मामले में यम के स्वाध्याय और नियम के अपरिग्रह का महत्व है। शरीर के मामले में शौच का महत्व है।

1.स्वाध्याय : स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं का अध्ययन करना। अच्छे विचारों का अध्ययन करना और इस अध्ययन का अभ्यास करना। इससे विचारों की शुद्धि होती है। स्वाध्याय के लिए व्यर्थ की बहस और मानसिक द्वंद्व से बचना जरूरी है।

आप स्वयं के ज्ञान, कर्म और व्यवहार की समीक्षा करते हुए पढ़ें, वह सब कुछ जिससे आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता हो साथ ही आपको इससे खुशी ‍भी मिलती हो, तो बेहतर किताबों को अपना मित्र बनाएँ। जीवन को नई दिशा देने की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। अच्छा सोचना और महसूस करना स्वाध्याय की पहली शर्त है।

2.अपरिग्रह : इसे अनासक्ति भी कहते हैं अर्थात किसी भी विचार, वस्तु और व्यक्ति के प्रति मोह न रखना ही अपरिग्रह है। कुछ लोगों में संग्रह करने की प्रवृत्ति होती है, जिससे मन में भी व्यर्थ की बातें या चीजें संग्रहित होने लगती हैं। इससे मन और शरीर में संकुचन पैदा होता है। इससे कृपणता या कंजूसी का जन्म भी होता है। आसक्ति से ही आदतों का जन्म भी होता है। संकल्पपूर्वक मन, वचन और कर्म से इस प्रवृत्ति को त्यागना ही अपरिग्रही होना है।

3.प्राणायाम : शरीर और मन के बीच की कड़ी है प्राणायाम। यह हमारे प्राणों की आयु को संचालित करता है। शुद्ध वायु ही शरीर की आयु है। प्राणायाम के महत्व को समझना और इसे नियमित करने से मन और शरीर से नकारात्मकता खत्म होती है साथ ही यह हमारे भीतर भरपूर ऑक्सिजन का निर्माण करता है जिसके माध्यम से शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता मिलती है।

प्राण, अपान, समान आदि वायुओं से मन को रोकने और शरीर को साधने का अभ्यास करना अर्थात प्राणों को आयाम देना ही प्राणायाम है। 'प्राणस्य आयाम: इत प्राणायाम'। 'श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायाम'-(यो.सू. 2/49) अर्थात प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना प्राणायाम है। वेद और योग में आठ प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है, जिनमें जीव विचरण करता है।

4.आसन : 'आसनानि समस्तानियावन्तों जीवजन्तव:। चतुरशीत लक्षणिशिवेनाभिहितानी च।'- अर्थात संसार के समस्त जीव जन्तुओं के बराबर ही आसनों की संख्या बताई गई है। इस प्रकार 84000 आसनों में से मुख्य 84 आसन ही माने गए हैं।

आसनों का मुख्य उद्देश्य शरीर के मल का नाश करना है। शरीर से मल या दूषित विकारों के नष्ट हो जाने से शरीर व मन में स्थिरता का अविर्भाव होता है। शांति और स्वास्थ्य लाभ मिलता है। शरीर बृहत्तर ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप है। अत: शरीर के स्वस्थ रहने पर मन और आत्मा में संतोष मिलता है।

आसन एक वैज्ञानिक पद्धति है। ये हमारे शरीर को स्वच्छ, शुद्ध व सक्रिय रखकर मनुष्य को शारीरिक व मानसिक रूप से सदा स्वस्थ बनाए रखते हैं। केवल आसन ही एक ऐसा व्यायाम है जो हमारे अंदर के शरीर पर प्रभाव डाल सकता है।

5.प्रत्याहार : वासनाओं की ओर जो इंद्रियाँ (आँख, कान, नाक आदि) निरंतर गमन करती रहती हैं, उनकी इस गति को अपने अंदर ही लौटाकर भीतर की ओर लगाना या स्थिर रखने का प्रयास करना प्रत्याहार है। जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है उसी प्रकार इंद्रियों को घातक वासनाओं से हटाकर अपनी आंतरिकता की ओर मोड़ देने का प्रयास करना ही प्रत्याहार है। यह खुद से मिलने का एक तरीका है।

क्या है वासनाएँ : काम, क्रोध, लोभ, मोह यह तो मोटे-मोटे नाम हैं, लेकिन व्यक्ति उन कई बाहरी बातों में रमा रहता है जो आज के आधुनिक समाज की उपज हैं, जैसे शराबखोरी, सिनेमाई दर्शन और चार्चाएँ, अत्यधिक शोरपूर्ण संगीत, अति भोजन जिसमें माँस भक्षण के प्रति आसक्ति, महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ और ऐसी अनेक बातें जिससे क‍ि पाँचों इंद्रियों पर अधिक भार पड़ता है और अंतत: वह समयपूर्व निढाल हो बीमारियों की चपेट में आ जाती है।

6.ध्यान का महत्व : रोग और शोक मानसिक दुख देते हैं। दोनों की ही उत्पत्ति मन, मस्तिष्क और शरीर के किसी हिस्से में होती है। ध्यान से सर्वप्रथम सभी तरह की अनावश्यक गतिविधि रूकने लगती है। श्वास-प्रश्वास में सुधार होने से किसी भी तरह के दुख के मामले में हम आवश्यकता से अधिक चिंता नहीं करते। ध्यान मन और ‍मस्तिष्क को भरपूर ऊर्जा और सकारात्मकता से भर देता है। शरीर भी स्थित होकर रोग से लड़ने की क्षमता प्राप्त करने लगता है।

अंतत: यदि आप ‍जीवन में हमेशा खुश और स्वस्थ रहना चाहते हैं तो शरीर और मन की बुरी आदतों को समझते हुए उन्हें योग द्वारा दूर करने का प्रयास करें। आपका छोटा-सा प्रयास ही आपके जीवन में बदलाव ले आएगा। विचारों पर गंभीरता पूर्वक विचार करें कि वे हमारे जीवन को कितना नुकसान पहुँचाते हैं और उनसे हम कितना फायदा उठा सकते हैं।
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें