सेक्स और भय...!

योग का मनोविज्ञान जानें

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आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिन्होंने भारतीय की धारणा को समझा है उनके लिए यह दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में अधूरे थे, लेकिन फिर भी इनकी प्रतिभा पर शंका नहीं की जा सकती, क्योंकि उन्होंने इतना तो किया कि मन के एक हिस्से को खुद समझा और दुनिया को समझाया। मनोविज्ञान के क्षेत्र में इनके योगदान को भूला नहीं जा सकता।

दुःख की बात है कि दुनिया के महान मनोवैज्ञानिकों में इनकी गिनती की जाती है और हम भारतीय इन्हें बड़े चाव से पढ़कर लोगों के समक्ष इनकी बातें इसलिए करते हैं कि कहीं न कहीं हम स्वयं को बौद्धिक साबित करना चाहते हैं- यह तीसरे तरह का मनोरोग है।

पतंजलि से श्रेष्‍ठ मनोवैज्ञानिक खोजना मुश्‍किल है। पतंजलि कहते हैं कि इस 'चित्त' को समझो। पतंजलि मानते हैं कि सभी रोगों की शुरुआत चित्त की अतल गहराई से होती है। शरीर और मस्तिष्क पर उसका असर बाद में नजर आता है। चित्त का अर्थ है अंत:करण। में ‍बुद्धि, अहंकार और मन इन तीनों को मिलाकर 'चित्त' कहा गया है। मन को जानने को ही मनोविज्ञान कहते हैं, लेकिन अब आप सोचें मन से बढ़कर तो चित्त है। इस चित्त को समझना पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों के बस की बात नहीं।

पतंजलि का दर्शन:
अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
।।ॐ।।योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।।ॐ।हमने सुना है कि सिग्मंड फ्रायड का मानना था कि सारे मनोरोगों का कारण है। इसे वे सेक्स मनोग्रस्तता कहते थे। पूरा पश्चिम इसी रोग से ग्रस्त है। चौबीस घंटे सेक्स की ही बातें सोचना। कहते हैं कि फ्रायड भी इसी रोग से ग्रस्त थे। उनके शिष्य कार्ल गुस्ताव जुंग के अनुसार मृत्यु का ही मूल में सभी मनोरोगों का कारण है। आश्चर्य कि गुरु और शिष्‍य में इतनी असमानता। कहते हैं कि पूरा पूरब इसी रोग से ग्रस्त है तभी तो वह जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा पाना चाहते हैं।
वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती है:- (1) प्रमाण, (2) विपर्यय, (3) विकल्प, (4) निद्रा और (5) स्मृति। कर्मों से क्लेश और क्लेशों से कर्म उत्पन्न होते हैं- क्लेश पाँच प्रकार के होते हैं- (1) अविद्या, (2) अस्मिता, (3) राग, (4) द्वेष और (5) अभिनिवेश। इसके अलावा चित्त की पाँच भूमियाँ या अवस्थाएँ होती हैं। (1) क्षिप्त, (2) मूढ़, (3) विक्षित, (4) एकाग्र और (5) निरुद्ध। ऊपर लिखें एक-एक शब्द और उनके अर्थ को समझने से पतंजलि के मनोदर्शन का पता चलता है।



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