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Womens Day 2020 : क्‍या महिलाएं उतनी आजाद और निडर हैं, जितनी वे नजर आती हैं?

Updated: गुरुवार, 5 मार्च 2020 (18:51 IST)
सांत्वना पाल
पूरी दुनिया में महिला दिवस मनाया जाएगा। लेकिन इस दिन के साथ ही यह सवाल भी मन में उभर आता है कि क्‍या महिलाएं उतनी जागरुक, स्‍वतंत्र और निडर हो पाईं हैं, जितना दिखाई देता है। क्‍या वे अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। अदालत जाने में सक्षम हैं। क्‍या वे अपने लिए न्‍याय के लिए संघर्ष कर पाती हैं।

दरअसल, अदालत जैसे कई मामलों में महिलाएं आज भी फैसले लेने के लिए उतनी सक्षम नहीं हैं, जितना वे नजर आती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि महिलाएं खुद को इतना स्वतंत्र नहीं समझतीं कि इतना बड़ा कदम उठा सकें। उनके लिए कानून की पेंचीदा गलियों में भटकना आसान नहीं। उन्हें किसी का सहारा या समर्थन भी नहीं मिलता।  जिससे उन्हें घर से लेकर बाहर तक विरोध का सामना करना पड़ता है।

समाज के इस नकारात्मक वातावरण की वजह से वे अन्याय सहना चुनती हैं। कानून होते हुए भी वे उसकी मदद नहीं ले पाती हैं। आमतौर पर लोग आज भी औरतों को दोयम दर्जे का नागरिक ही मानते हैं। कारण चाहे सामाजिक रहे हों या आर्थिक, परिणाम हमारे सामने हैं। आज भी दहेज के लिए हमारे देश में हजारों लड़कियां जलाई जा रही हैं। रोज न जाने कितनी ही लड़कियों को यौन शोषण की शारीरिक और मानसिक यातना से गुजरना पड़ता है। कितनी ही महिलाएं अपनी संपत्ति से बेदखल होकर दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

तो सूची बहुत लंबी है
महिला श्रमिकों का गांव से लेकर शहरों तक आर्थिक व दैहिक शोषण होना आम बात है। अगर इन अपराधों की सूची तैयार की जाए तो न जाने कितने पन्नो भर जाएंगे। ऐसा नहीं है कि सरकार को इन अत्याचारों की जानकारी नहीं है या फिर इनसे सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। जानकारी भी है और कानून भी हैं, मगर महत्वपूर्ण यह है कि इन कानूनों के बारे में आम महिलाएं कितनी जागरूक हैं? वे अपने हक के लिए इन कानूनों का कितना उपयोग कर पाती हैं?

संविधान ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि कानून के सामने स्त्री और पुरुष दोनों बराबर हैं। अनुच्छेद 15 के अंतर्गत महिलाओं को भेदभाव के विरुद्ध न्याय का अधिकार प्राप्त है। संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के अलावा भी समय-समय पर महिलाओं की अस्मिता और मान-सम्मान की रक्षा के लिए कानून बनाए गए हैं, मगर क्या महिलाएं अपने प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ न्यायालय के द्वार पर दस्तक दे पाती हैं?

साक्षरता और जागरूकता के अभाव में महिलाएं अपने खिलाफ होने वाले अन्याय के विरुद्ध आवाज ही नहीं उठा पातीं। शायद यही सच भी है। भारत में साक्षर महिलाओं का प्रतिशत 54 के आसपास है और गांवों में तो यह प्रतिशत और भी कम है। तिस पर जो साक्षर हैं, वे जागरूक भी हों, यह भी कोई जरूरी नहीं है। पुराने संस्कारों में जकड़ी महिलाएं अन्याय और अत्याचार को ही अपनी नियति मान लेती हैं और इसीलिए कानूनी मामलों में कम ही रुचि लेती हैं।

हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल, लंबी और खर्चीली है कि आम आदमी इससे बचना चाहता है। अगर कोई महिला हिम्मत करके कानूनी कार्रवाई के लिए आगे आती भी है, तो थोड़े ही दिनों में कानूनी प्रक्रिया की जटिलता के चलते उसका सारा उत्साह खत्म हो जाता है।

लेकिन महिलाओं को यह बात समझना होगी कि जो अपनी मदद खुद नहीं करता, उसकी मदद ईश्वर भी नहीं करता। अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए खुद महिलाओं को ही आगे आना होगा। उन्हें इस अत्याचार, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठानी होगी। उन्‍हें यह बात जोर देकर कहनी होगी कि वे भी इंसान हैं और एक इंसान के साथ जैसा व्यवहार होना चाहिए वैसा ही उनके साथ भी किया जाना अनिवार्य है।

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