कईं वर्ष पूर्व जिस कंपनी में मैं कार्यरत थी, वहाँ एक परियोजना की अध्यक्ष थी। मेरे दल में अधिकतर विवाहित महिलाएँ थीं, जो कि एक ही आयु वर्ग तथा समान पृष्ठभूमि की थीं। हमें बैठने के लिए एक बड़ा हॉल दिया गया था।
मुझे एक कैबिन मिला था, जिसे काँच की दीवार से अलग किया गया था, जबकि और सभी बाहर बैठते थे। लंच के दौरान महिलाएँ बाहर बैठकर गप्पें लगाती थीं। उनकी तेज आवाजें मेरे कैबिन के हिस्से तक पहुँचती थीं और मैं उनकी पारिवारिक बातें सुनती थी। अधिकांश महिलाएँ वाचाल थीं सिर्फ एक के सिवाय, जिसका नाम नीता था। सभी अपने पति, सास-ससुर की शिकायतें करतीं, जबकि नीता सदैव अपने परिवार के बारे में सकारात्मक बातें कहती।
जब नीला अपनी सास की शिकायत करती तो नीता कहती है- मेरी सास तो मेरी माँ के समान है। फिर कुसुम्मा कहती कि मेरी ननद मुझसे बहुत अधिक ईर्ष्या करती है और नीता को यह कहते हुए सुना जाता कि मेरी ननद तो बहुत अच्छी है, हम एक-दूसरे से प्रत्येक वस्तु बहनों की तरह बाँटते हैं।
जैसा कि कामकाजी औरतों की यह शिकायत होती है कि घर और ऑफिस के दायित्वों को निभाने में पति और ससुराल का बहुत कम सहयोग मिलता है, वहीं नीता अपने ससुर के बारे में बताती कि कैसे वे बच्चों के होमवर्क करने में उनकी मदद करते हैं।
गीता का पति गर्म मिजाज है और वह बताती कि किस तरह उसका पति छोटे-छोटे मुद्दों पर बहुत ज्यादा क्रोधित हो जाता है। लेकिन इस पर नीता कहती कि वह अपने पति से अधिक गुस्सैल है और वे शायद ही कभी अपना धैर्य खोते हैं। एक दिन नीता गुलाबी रंग की खूबसूरत साड़ी पहनकर ऑफिस आई।
सभी ने उसकी साड़ी की प्रशंसा की और मैंने उससे पूछा कि तुमने यह कहाँ से खरीदी? क्या आज तुम्हारा जन्मदिन है। नीता ने शर्माते हुए उत्तर दिया, हाँ मैडम, यह मेरे पति की ओर से जन्मदिन का उपहार है। और इस प्रकार हम प्रतिदिन उसके आदर्श परिवार की कहानी सुनते थे।
जैसा कि कामकाजी औरतों की यह शिकायत होती है कि घर और ऑफिस के दायित्वों को निभाने में पति और ससुराल का बहुत कम सहयोग मिलता है, वहीं नीता अपने ससुर के बारे में बताती कि कैसे वे बच्चों के होमवर्क करने में उनकी मदद करते हैं तथा उसका पति रसोई में कैसे उसका सहयोग करता है।
आमतौर पर ऐसी धारणा बन गई थी कि नीता बहुत भाग्यशाली है और शायद यह विश्व का आठवाँ आश्चर्य हैं। सावित्री जो कवयित्री थी कहती- नीता का परिवार चाँद से भी बेहतर है क्योंकि उसमें कोई भी बुराई नहीं है। वो हँसी-मजाक वाले दिन बीतते रहे और धीरे-धीरे समूह समाप्त हो गया और सभी अपने-अपने रास्ते चले गए। कई वर्ष पश्चात मुझे नीता का फोन आया।
पहले मैं उसे पहचान नहीं पाई परंतु धीरे-धीरे मुझे उसकी कहानियाँ स्मृति में आने लगीं। वह श्रीमती संपूर्ण थी, उसने धीमी आवाज में फोन पर कहा। मुझे उसकी आवाज में थकान और चिंता महसूस हुई। वह एक दिन आकर मुझसे मिलना चाहती थी। जिस दिन वह मेरे ऑफिस में आई, मैं उसकी दशा देखकर चकित रह गई। जबकि उसके दोस्त युवा से प्रौढ़ हुए थे।
नीता को देखकर ऐसा लगा जैसे वह सीधे बुढ़ापे पर आ गई है। वह कमजोर और उसके बाल सफेद हो गए थे। हमने कुछ देर अपने पुराने साथियों के बारे में बात की। लेकिन उसे पता नहीं था कि वे सब अब कहाँ हैं। इसलिए मैंने उससे कहा- नीला जो अपनी सास से झगड़ा करके घर से अलग हो गई थी। अंततः वापस चली गई। और उस बूढ़ी औरत की बीमारी में उसकी देखभाल कर रही है।
कुसुम्मा ने अपनी ईर्ष्यालु ननद की मुसीबत के समय मदद की और गीता का पति समय के साथ शांत मिजाज हो गया है। ज्यादातर लोगों के लिए समय एक पहिए की तरह घूम गया है, उन्होंने समय के साथ आने वाली चुनौतियों और जिम्मेदारियों का साहस के साथ सामना किया। तब फिर मैंने नीता से पूछा- अब बताओ तुम कैसी हो? तुमको इन लोगों जैसी परेशानी कभी नहीं हुई।
मेरी बातें सुनकर वह और अधिक दुःखी लगने लगी और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। मैडम आप उन परेशानियों के बारे में नहीं जानती जिनका मैं सामना कर रही हूँ। तुम और परेशानियाँ, नीता!
-हाँ, मैडम मैं अवसाद से गुजर रही हूँ। मुझे मनोचिकित्सक के पास जाना पड़ता है।
इसमें कुछ भी गलत नहीं है नीता। ये अच्छी बात है कि तुम अपनी स्थिति से निपटने के लिए डॉक्टर की मदद ले रही हो। यह ठीक वैसा ही है जैसे हम किसी और परेशानी में डॉक्टर से मिलते हैं। इसमें दुःखी होने की कोई बात नहीं है।
-मैं बहुत लंबे समय से तनाव में हूँ और मुझे मनोचिकित्सक ने कहा है कि अगर मैं किसी ऐसे व्यक्ति से अपनी बातें बाँटूँ जिसका मैं आदर करती हूँ तो इससे मुझे मदद मिलेगी। इसलिए मैंने आपसे मिलने के लिए कहा।
'मुझे खुशी हुई नीता कि तुमने मेरे बारे में सोचा, लेकिन तुम अवसाद में क्यों हो? तुम्हारा इतना अच्छा पारिवारिक जीवन था।'
-मुझे हमेशा ढेर सारी समस्याएँ रहीं। मैं कभी उनके बारे में बात नहीं कर पाई। मेरी सास और ननद नीला और कुसुम्मा की सास और ननद से भी खराब थी। मेरे पति हर बात में उनका पक्ष लेते थे। मैं बहुत दुःखी थी। जब भी मेरे साथी अपने परिवारों के बारे में बात करती थी तो मैं हमेशा चाहती थी कि मैं उनसे अपनी कहानी बाँट सकूँ, लेकिन मेरी माँ हमेशा कहा करती थी कि मैं कभी अपने परिवार की बुराई समाज में किसी से न करूँ। उन्होंने कहा कि मैं हमेशा अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखूँ। घर में कुछ भी हो, बाहर हमेशा परिवार की प्रशंसा करूँ। इसी कारण मैं खुश दिखने का नाटक करती। मेरे लिए उन्मुक्त होने का अर्थ था, अपनी कमजोरियों को दर्शाना।
मैं उसके शब्दों से स्तब्ध थी। मैं हमेशा सोचती थी कि उन्मुक्त होना एक वरदान है। मुझे पढ़ाया गया था कि अपने चारों ओर के दुःख, परेशानियों को देखो और फिर उनकी तुलना करो, मैं जब भी दुःखी होती तो अपने आशीर्वादों को ध्यान करती। यही मुझे सबसे बुरे दिनों में भी क्रियाशील रखती है।
इसी बीच नीता अपने दिल की बातें कहती रही। क्या आपको वह गुलाबी साड़ी याद है, जो मैंने एक दिन पहनी थी और जिसकी सबने खूब तारीफ की थी। यहाँ तक कि आपने भी पूछा था कि मैंने यह कहाँ से खरीदी। मैंने झूठ कहा था कि ये मेरे पति ने मुझे जन्मदिन पर भेंट की है। उन्होंने मुझे कभी जन्मदिन पर कुछ नहीं दिया। किसी ने कभी रसोई में या बच्चों को होमवर्क कराने में मेरी मदद नहीं की। मैंने हमेशा संघर्ष किया और सब कुछ करना चाहा। मेरा जीवन मेरे साथियों से जरा भी अलग नहीं था। लेकिन कम से कम वो उनके बारे में बात तो कर सकते थे।
मैं हमेशा यह दिखाने में व्यस्त रही कि मेरा जीवन संपूर्ण है। अब जब तुम्हें महसूस हो गया है कि वो ठीक नहीं था तो उसे भूल जाओ और खुश रहने की कोशिश करो। कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता। मैंने अपने जीवन में दिखावा करने की बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। मैं लगातार अवसाद से गुजरी। मैं आशा करती हूँ कि आप समझ पाएँगी कि क्यों मैं आज आपके पास आकर सच बोल रही हूँ।
मैंने नीता का हाथ अपने हाथों में लिया और कहा- हर किसी के मन में कुछ राज होते हैं। हम सभी में कमियाँ हैं, जिन्हें हम छिपाना चाहते हैं। परंतु समस्या तब खड़ी होती है जब हम अपनी कमियाँ खुद को भी नहीं बताते और वो दिखाना चाहते हैं, जो हम नहीं हैं। मोर जब नाचता है तो वो अच्छा लगता है, मगर वो गा नहीं सकता।
कोयल काली होती है, लेकिन उसकी आवाज बहुत अच्छी है, परंतु वह कभी नाच नहीं सकती और मोर को भी गाने की कोशिश नहीं करना चाहिए। हम तभी सुखी जीवन जी सकते हैं जब हम अपनी गलतियों और नाकामियों को पहचानें और अपनी चारित्रिक मजबूती से उन पर विजय पाएँ।