वसंत आता तो है...
- साधना देवेश
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वसंत आता है जंगलों में
जहां फुर्सत नहीं पाते
कठफोड़वे सारा-सारा दिन
दरख्तों के तनों पर
अपनी नुकीली चोंच से
ताल बजाते।
वसंत आता है
उन मैदानों में
जहां चितकबरे हिरनौटे
भरते हैं कुलांचे,
हवा की भीनी महक
वृक्षों के घने झुरमुटों में
संग लिए फिरती है
वनस्पतियों की गंध।
वसंत आता है
उन बागानों में
जहां घास के विस्तार के साथ
रंग-बिरंगी फूलों की क्यारियां
देती हैं परिन्दों को सुख।
वसंत आता है सुनने
रात की रहस्यमय पदचापें
अंकुर अंखुआने की आहटें लिए
भोर संजो लाती है
सूरज का उजाला।
वसंत आता है
उन वनवीथियों में
जहां पतझारी बिछौनों पर
धरी रहती है
शीत ऋतु की कासनी हंसी।
वसंत आता है
उन कछारों में
जहां सिमटकर चलती नदी के कगार पर
थमे दरख्तों की
अकिंचन टहनियां
कोंपलों की सौगात पा
हो उठती हैं धन्य-धन्य।
वसंत आता तो है
पर नहीं गाता है इन दिनों शुद्ध,
कंठ उसका
क्यों रह-रह हो जाता है अवरुद्ध?
प्रकृति का कुपित स्वर सुन
हलरता है समंदर, भूकम्प बरपाता,
घरोंदे ढहा कर/कांपती भूमि पर
हवा में बारूद का धुआं
क्या वसंत महसूस नहीं करता है?
इमारतों से ढंकी-मुंदी गलियों में
लौह राक्षसों की
हुंकारती प्रदूषित हवाओं में
क्या कोई नहीं महसूस करता है
वसंत...
वसंत आता तो है
सब जगह
आकाश में और पलाश पर
आम्रवन में बौर की तलाश पर
बस्तियों के कोलाहल में
परिन्दों की चहकारों-सा
सुन नहीं पाते हम भी
उसका स्वर स्पष्ट
और वह भी
नहीं गाता है इन दिनों शुद्ध।
