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वेलेंटाइन स्पेशल : ये इश्क हाय बैठे बिठाए जन्नत दिखाए....

Updated: शनिवार, 13 फ़रवरी 2021 (18:41 IST)
वेलेंटाइन वीक चल रहा है....प्यार का व्यापार जोरों पर है। संवेदनाओं के एहसास से ज्यादा प्रस्तुतिकरण के जमाने में प्रेम वस्तु में बदलता जा रहा है। हम वो पीढ़ी हैं जिसे दोनों दौर देखने को मिल रहे हैं। परिवर्तन को समझने और झेलने वाली। हर जन्म में एक-दूसरे को निभाने की कसमें खाने वाले प्रेमी-प्रेमिका, जोड़े, अब प्रेम के भी मायने बदलने लगे हैं। प्रेम के मीठे अनंत समंदर को सात दिनों में समेट लिया है। किस्सा चाहे जो हो पर हमारा तो माहौल ही अलग रहा।  प्रेम के मामले में बारों मास बसंत वाले देश में तो रोज ही रोज डे। प्रेमाकर्षण से उपजा नैन-मटक्का जब किन्हीं बड़ों के द्वारा देख लिया जाता तब चोरी पकड़ी गई की शर्म से हुए लाल सुर्ख चेहरे किसी गुलाब से कम नहीं होते। फिर चाहे शादी हुई हो या इश्क ही पनप रहा हो। 
 
प्रपोज डे के किस्से मौके मिलने की तासीर पर निर्भर हुआ करते थे। किताबों, रुमालों, खतों और भी उपलब्ध साधनों का योगदान रहा करता। जिनमें कई एकदूसरे के पसंद के उपहार भी हो सकते हैं। दिखावे से दूर अकेले में देना या पहुंचवाना बड़ा जटिल काम ही था। उन्हें देने-स्वीकारने के उस मधुर पल को शायद ये लोग प्रपोज डे कहते हैं। 
 
“आज चाय किसने बनाई?” या “ये तुम्हारे हाथों का बना हुआ नहीं है?” या “ ये तुम ही हो, तुमने ही किया होगा.” का विश्वास और प्यार का ‘स्वाद’ जब नसों में दौड़ता है तभी दिलो-दिमाग चाकलेट सा नर्म-मुलायम, मीठा, नशीला विश्वास आपको किसी के अति प्रिय होने का अहसास कराता है।
 
प्यार की शहद सी शुद्ध मिठास को महसूस करना ही ‘टेडी डे’ होता होगा। भालू और शहद का नाता कौन नहीं जानता। फूलों का रस, कितना मधुर कितना मदिर, प्यार भी तो ऐसा ही है, जिंदगी गुलजार करता हुआ। 
 
एक-दूसरे के लिए जीना-मरना तो हमारी प्राकृतिक प्रेम की विशेषता है। वेद-पुराण, प्रेम कहानियों के किस्सों से उदाहरण भरे पड़े हैं। “वचनबद्धता” हमारे हर रिश्तों में है। हमारी विरासत, संस्कृति हमें यही सिखाती है। ब्रह्माण्ड के प्रत्येक जीव,प्राणी, पेड़-पौधे, पञ्च तत्वों से प्यार और रक्षा की वचनबद्धता ही हमारी पहचान है। यही ‘प्रॉमिस डे’ है। खुद से खुद के वादे भी तो निभाने है। 
 
प्रेमासक्ति में ‘चुम्बन’ जादुई दुनिया का अहसास कराता है। इसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति और क्रियान्वयन बेशर्मी का प्रतीक भी होती। ऐसा ही कुछ “हग डे” के लिए भी बोल सकते हैं। इनके अलग से कोई टाइम-टेबल नहीं होते। मौके लपकने पड़ते। कई दफा तो प्रिय की झूठी मिठाई, आधा काटा खाया हुआ पान, चाय-पानी का मग्गा-गिलास जैसे अन्य कई करामातें होतीं या इजाद कर लीं जातीं जो जिसकी औकात व हैसियत में हो। या जितना साहस... नहीं... नहीं दुस्साहसी हो वैसा खेल ले वक्त और मौके के साथ। 
 
रही बात “हग डे” की तो दुनिया में इसका सबसे बड़ा और गर्व करने वाले प्यार करने का उदाहरण आप सैनिकों और उनके परिजन व  उनकी प्राण प्रियाओं से जानें। बिछोह के साए में हर पल गुजारने वाले वे प्रेमी-प्रेमिका धरती के सर्वश्रेष्ठ प्यार के नुमाइंदे हैं। जो अपने आलिंगन में फोटो, प्रेम निशानियां ले कर उनके होने को महसूस करते हैं पर अपने प्राणों को अपनी धरती मां की रक्षा के लिए लुटा देते हैं। उनका हर दिन वेलेंटाइन डे होता है।  उनका तो “रंग दे बसंती चोला” ही अटल-अमर प्रेम है। वफादारी और निडरता के रंग से रंगी इनकी प्रेम डगरिया सबसे पावन, सबसे पुण्य प्रेम कहानी है। 
 
चाहे जो हो...मानना ही होगा कि “ये इश्क हाय बैठे-बिठाए जन्नत दिखाए....हां...ओ रामा...”
 
लेखक के बारे में
डॉ. छाया मंगल मिश्र
सामाजिक विचारक, प्रोफेसर और संवेदनशील लेखिका.... और पढ़ें

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